भारतीय एयरपोर्ट का नया खेल: ऐप्स के ज़रिए डेटा की लूट!

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारतीय एयरपोर्ट का नया खेल: ऐप्स के ज़रिए डेटा की लूट!
Overview

भारत के बड़े एयरपोर्ट अब सिर्फ़ ट्रांज़िट पॉइंट नहीं रहे, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म बन गए हैं। यात्रियों की सुविधाओं के लिए ऐप का इस्तेमाल ज़रूरी कर दिया गया है, जिससे उनकी हरकतों का डेटा इकट्ठा किया जा रहा है। ये तरीका UPI जैसे पेमेंट सिस्टम को दरकिनार कर रहा है और प्राइवेसी के लिए बड़ा ख़तरा पैदा कर रहा है।

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सफ़र से डेटा तक: एयरपोर्ट का नया मिशन

भारतीय एयरपोर्ट सिर्फ़ यात्रियों को मंज़िल तक पहुँचाने की जगह नहीं रह गए हैं, बल्कि अब वे डेटा इकट्ठा करने के बड़े खेल में उतर आए हैं। प्राइवेट एयरपोर्ट ऑपरेटर एक बंद सिस्टम बना रहे हैं, जहाँ लाउंज एक्सेस से लेकर खाने-पीने तक सब कुछ उनके अपने मोबाइल ऐप्स के ज़रिए ही मिलेगा।

इससे यात्री एक कंट्रोल्ड डिजिटल माहौल में फंस जाते हैं। एयरपोर्ट ऑपरेटरों को यात्रियों की ख़रीदारी की आदतें, कितनी बार सफ़र करते हैं, और कहाँ-कहाँ जाते हैं, इन सब बातों की बारीक जानकारी मिल जाती है। यह सब जानकारी एयरपोर्ट के सामान्य कामकाज से कहीं ज़्यादा है।

कमाई का नया तरीका या डेटा पर कब्ज़ा?

अक्सर देखा जा रहा है कि ये ऐप, UPI जैसे स्टैंडर्ड पेमेंट सिस्टम की जगह अपने अंदरूनी वॉलेट या पेमेंट गेटवे का इस्तेमाल करने पर ज़ोर देते हैं। ऐसा करने के पीछे दो मक़सद हैं - एक तो मर्चेंट डिस्काउंट रेट से कमाई और दूसरा, यूज़र को अपने डिजिटल इकोसिस्टम में बाँध लेना।

सरकारी DigiYatra ऐप के साथ इंटीग्रेशन से यात्रियों की पहचान का डेटा उनके कमर्शियल एक्टिविटी से जुड़ जाता है। एयरपोर्ट ऑपरेटरों के लिए यह एक बड़ा 'एसेट' बन गया है - हाई-नेट-वर्थ यात्रियों की एक स्थायी, मल्टी-मोडल प्रोफाइल। इससे भविष्य में डेटा बेचकर या बेहतर सर्विस देकर भारी कमाई की जा सकती है।

रेगुलेटर्स के लिए चुनौती

एयरपोर्ट ऑपरेटर भले ही डिजिटल दुनिया से ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाने में लगे हों, लेकिन सरकारी नियम-कानून अभी भी पीछे हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस काम के लिए ज़रूरत से ज़्यादा डेटा इकट्ठा किया जा रहा है।

डेटा कम करने के लिए कोई खास नियम नहीं हैं। मौजूदा सिस्टम में, एयरपोर्ट ऑपरेटर डेटा साइलो की तरह काम कर रहे हैं। यानी, डेटा एक जगह बंद है और आपस में इंटरकनेक्ट नहीं हो रहा। इससे यात्रियों की प्रोफाइलिंग और उनके डेटा की सुरक्षा पर सवाल खड़े होते हैं। डेटा प्रोटेक्शन कानूनों को इन प्राइवेट सिस्टम में कैसे लागू किया जाएगा, यह देखना बाकी है।

निवेशकों और यात्रियों के लिए ख़तरे

एयरपोर्टों की यह डिजिटल दौड़ निवेशकों और रेगुलेटर्स के लिए कई ख़तरे लेकर आई है। अगर भविष्य में सरकार यह नियम बना दे कि सभी सर्विसेज़ ओपन-एक्सेस हों या किसी भी पेमेंट सिस्टम से ली जा सकें, तो अभी के बिज़नेस मॉडल बेकार हो सकते हैं।

इसके अलावा, यात्रियों के इतने बड़े डेटा का भंडार साइबर हमलों के लिए एक बड़ा निशाना बन सकता है। जैसे-जैसे जाँच बढ़ेगी, इन डिजिटल सिस्टम को चलाने का खर्च शायद डेटा से होने वाली कमाई से ज़्यादा हो जाए, खासकर तब जब सरकार इन 'वॉल-गार्डन' आर्किटेक्चर को ख़त्म करके सबके लिए बराबरी और यात्रियों की आज़ादी को बढ़ावा दे।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.