भारत में होम सर्विसेज कंपनियों में छिड़ी प्राइस वॉर ने ग्राहकों को तो बड़ी राहत दी है, लेकिन कंपनियों के लिए यह एक बड़ी मुसीबत बनती दिख रही है। Urban Company का InstaHelp, Snabbit और Pronto जैसी कंपनियां अब ₹29 प्रति घंटा की दर से सेवाएं दे रही हैं। अगस्त की शुरुआत में जहां इन प्लेटफॉर्म्स पर रोज़ाना 1 लाख ऑर्डर पार कर लिए थे, वहीं अब इन कंपनियों का मासिक कैश बर्न (cash burn) बढ़कर $16-17 मिलियन यानी करीब ₹140 करोड़ हो गया है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह ग्रोथ मॉडल मुनाफे वाला है या फिर भारी सब्सिडी (subsidy) अब कंपनी पर बोझ बन रही है।
₹29 प्रति घंटा और 10 मिनट में सर्विस!
भारत में इंस्टेंट होम सर्विसेज सेक्टर में मानो जंग छिड़ गई है। कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए अपनी कीमतें इतनी कम कर रही हैं कि अब ₹29 प्रति घंटा भी वसूल रहे हैं, और वो भी 10 मिनट के अंदर सर्विस देने का वादा!
Urban Company का InstaHelp, Snabbit और Pronto जैसे प्लेटफॉर्म्स अभी मार्केट में अपनी पैठ बनाने पर जोर दे रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि 2 अगस्त 2026 तक इन सभी कंपनियों ने मिलकर रोज़ाना 1 लाख ऑर्डर्स का बड़ा आंकड़ा पार कर लिया।
मार्केट में कब्जा, जेब खाली!
लेकिन इस मार्केट पर कब्जा जमाने की लड़ाई महंगी साबित हो रही है। हाल ही में, Urban Company ने फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही में ₹65 करोड़ का कंसोलिडेटेड एडजस्टेड EBITDA लॉस (loss) दर्ज किया है। कंपनी ने इसका एक बड़ा कारण InstaHelp वर्टिकल में लगाया भारी निवेश बताया है। जून 2026 तक, इस पूरे सेक्टर का कलेक्टिव कैश बर्न (cash burn) लगभग $16-17 मिलियन यानी करीब ₹140 करोड़ प्रति माह आंका गया है। यह ट्रेंड इन स्टार्टअप्स की फाइनेंशियल हेल्थ पर सवाल खड़े कर रहा है।
वेंचर कैपिटल की फंडिंग और नई चिंताएं
कंपनियों की यह आक्रामक विस्तार की रणनीति वेंचर कैपिटल (venture capital) से मिली हालिया फंडिंग पर टिकी है। Snabbit ने अपने ऑपरेशंस को जारी रखने के लिए हाल ही में ₹531 करोड़ की सीरीज डी राउंड (Series D round) की फंडिंग जुटाई है, जबकि Pronto ने मई तक $20 मिलियन जुटाकर $200 मिलियन का वैल्यूएशन हासिल कर लिया है। इस पैसे का इस्तेमाल कस्टमर एक्विजिशन कॉस्ट (customer acquisition cost) को सब्सिडी देने और डिलीवरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में हो रहा है, लेकिन इस स्ट्रैटेजी की लंबी उम्र पर बहस छिड़ गई है।
निवेशकों के लिए यूनिट इकोनॉमिक्स (Unit Economics) सबसे बड़ा सवाल
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता यूनिट इकोनॉमिक्स (unit economics) को लेकर है। भले ही दिल्ली-एनसीआर और बेंगलुरु जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में इन प्लेटफॉर्म्स की मांग ज्यादा है, लेकिन कम आबादी वाले इलाकों में लगातार प्रॉफिट कमाना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। सस्ते दामों से ग्राहकों को आकर्षित करने का मतलब यह है कि अगर भविष्य में कीमतें बढ़ीं, तो ग्राहकों की वफादारी भी खत्म हो सकती है। इसके अलावा, इतनी तेजी से डिलीवरी का दबाव गिग वर्कर्स की पेमेंट और सर्विस क्वालिटी पर भी पड़ रहा है।
आगे क्या?
आने वाले क्वार्टर्स (quarters) में सबसे अहम बात यह होगी कि ये कंपनियां सब्सिडी वाले ग्रोथ मॉडल से सस्टेनेबल प्रॉफिट मार्जिन (sustainable profit margins) की ओर कैसे बढ़ती हैं। जैसे-जैसे कैपिटल मार्केट्स (capital markets) इन प्लेटफॉर्म्स की बिजनेस हेल्थ पर ज्यादा गौर करेंगी, उम्मीद है कि ध्यान सिर्फ ऑर्डर वॉल्यूम से हटकर इस बात पर जाएगा कि क्या ये कंपनियां भारी कैश आउटफ्लो (cash outflow) के बिना अपना मार्केट शेयर बनाए रख सकती हैं। निवेशक इस बात के संकेत देखेंगे कि क्या ये कंपनियां कैश बर्न रेट (burn rate) को कम करके मुनाफा कमाने में कामयाब होती हैं या नहीं।
