Electronics Manufacturing: सरकार का बड़ा फैसला, ₹7,500 करोड़ के 12 नए प्रोजेक्ट्स को मिली मंजूरी

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AuthorMehul Desai|Published at:
Electronics Manufacturing: सरकार का बड़ा फैसला, ₹7,500 करोड़ के 12 नए प्रोजेक्ट्स को मिली मंजूरी

सरकार ने Electronics Components Manufacturing Scheme के तहत ₹7,500 करोड़ से ज्यादा के 12 नए प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दे दी है। इस कदम का मकसद भारत में कच्चे माल और इक्विपमेंट का उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता को कम करना है।

भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को बूस्ट देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। Electronics Components Manufacturing Scheme के तहत कुल ₹7,500 करोड़ से ज्यादा के निवेश वाले 12 नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई है। यह कदम देश में सिर्फ असेंबलिंग तक सीमित न रहकर, अब कच्चे माल (Raw Materials) और कैपिटल गुड्स के उत्पादन को गहराई से जोड़ने की रणनीति का हिस्सा है।

क्या है सरकार का मास्टर प्लान?

IT सेक्रेटरी एस. कृष्णन ने इन प्रोजेक्ट्स की पुष्टि करते हुए बताया कि फोकस मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू चेन के अपर-स्ट्रीम हिस्से पर है। फिलहाल, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री के लिए जरूरी सब-असेंबलीज और उपकरणों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। सरकार का लक्ष्य अब एक ऐसी आत्मनिर्भर सप्लाई चेन बनाना है, जो ग्लोबल मार्केट में होने वाले उतार-चढ़ाव और प्राइस फ्लक्चुएशन से सुरक्षित रहे।

Semicon 2.0 का डिजिटल पुश

इस पूरे विस्तार को आसान बनाने के लिए सरकार ने Semicon 2.0 वेब पोर्टल लॉन्च किया है। यह पोर्टल 'Semicon India Programme' के लिए एक डिजिटल बैकबोन के तौर पर काम करेगा, जिससे कंपनियां इंसेंटिव के लिए आवेदन कर सकेंगी और कंप्लायंस जरूरतों को तेजी से मैनेज कर पाएंगी। इसका उद्देश्य लालफीताशाही कम करना और फंड का इस्तेमाल तेजी से सुनिश्चित करना है।

इनवेस्टर्स के लिए क्या हैं रिस्क?

हालांकि यह सरकार का बड़ा सपोर्ट है, लेकिन कंपनियों के लिए राह आसान नहीं है। हाई-प्रिसिजन कच्चे माल और कॉम्प्लेक्स इक्विपमेंट बनाना तकनीकी रूप से काफी कठिन काम है।

  • एग्जीक्यूशन रिस्क: फैक्ट्री सेटअप करने और क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को पूरा करने में देरी का जोखिम बना हुआ है।
  • ग्लोबल कॉम्पिटिशन: इन कंपनियों को सीधे तौर पर दुनिया के उन दिग्गजों से मुकाबला करना होगा जो पहले से मार्केट पर राज कर रहे हैं।
  • प्रॉफिट मार्जिन: शुरुआत के कुछ वर्षों में मार्जिन पर दबाव रह सकता है क्योंकि कंपनियां अपनी इकोनॉमीज ऑफ स्केल बनाने की कोशिश करेंगी।

इनवेस्टर्स को अब कंपनियों के प्रोजेक्ट कमीशनिंग टाइमलाइन और उनकी डेट मैनेजमेंट क्षमता पर पैनी नजर रखनी चाहिए। इन प्लांट्स के पूरी तरह ऑपरेशनल होने के बाद ही बैलेंस शीट पर असल असर दिखाई देगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.