Google DeepMind ने भारत में विकसित अपने खास AI मॉडल्स, ALU और AMED को अब 11 देशों में लॉन्च कर दिया है। ये मॉडल्स सैटेलाइट डेटा के जरिए खेती की बारीकियों को समझने में मदद करेंगे, लेकिन इसके साथ ही डिजिटल निर्भरता और डेटा ट्रांसपेरेंसी पर सवाल भी खड़े हो गए हैं।
भारत से ग्लोबल स्तर पर पहचान
Google DeepMind ने अपने AI-पावर्ड एग्रीकल्चरल टूल्स, Agricultural Landscape Understanding (ALU) और Agricultural Monitoring and Event Detection (AMED) का दायरा बढ़ा दिया है। ये सिस्टम सैटेलाइट तस्वीरों को प्रोसेस कर खेत की सीमाओं को मैप करने, फसल चक्र पर नज़र रखने और फसल की सेहत का सटीक डेटा मुहैया कराते हैं। ALU मॉडल के पास 15 साल का पुराना डेटाबेस उपलब्ध है, जबकि AMED हर 15 दिन में फील्ड लेवल की गतिविधियों को अपडेट करता है। अब ये टूल्स ओपन API और Google Earth के जरिए दुनिया भर की सरकारों और स्टार्टअप्स के लिए उपलब्ध हैं।
भारत में सफल प्रयोग
भारत में इन मॉडल्स ने पहले ही अपनी उपयोगिता साबित की है। तेलंगाना सरकार अपने ADeX प्लेटफॉर्म के जरिए किसानों को फसल और कीटों से जुड़ी सलाह दे रही है, वहीं कर्नाटक का जल संसाधन विभाग इसका इस्तेमाल सिंचाई दक्षता बढ़ाने में कर रहा है। मुंबई के स्टार्टअप Terrastack ने तो 14 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा कृषि भूमि को मैप करने के लिए इस इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी FAO और CarbonFarm जैसी संस्थाएं इसे खाद्य सुरक्षा और कार्बन क्रेडिट वेरिफिकेशन के लिए इस्तेमाल कर रही हैं।
तकनीक के साथ बढ़ते जोखिम
हालांकि AI से खेती में उत्पादकता तो बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी हैं। सबसे बड़ी चिंता 'डिजिटल डिपेंडेंसी' की है—जहां सरकारें और किसान खास कंपनियों के टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम में फंस सकते हैं। इसके अलावा, AI एल्गोरिदम की पारदर्शिता पर उठते सवाल और डेटा की गुणवत्ता में गड़बड़ी किसानों के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है। निवेशकों और जानकारों का मानना है कि इन बड़े क्लाउड-बेस्ड सिस्टम्स का भारी ऊर्जा खर्च और एल्गोरिदम की जटिलता आने वाले समय में एक बड़ा आर्थिक रिस्क बन सकती है।
