Google ने SynthID Detector पेश किया है, जो इनविजिबल वॉटरमार्क्स के जरिए AI-जेनरेटेड ऑडियो, वीडियो और इमेज की पहचान करेगा। यह बिजनेस के लिए डीपफेक फ्रॉड से बचने का एक नया तरीका है, हालांकि यह पूरी तरह से सुरक्षित समाधान नहीं है।
Google ने अपने नए डिजिटल टूल 'SynthID Detector' को लॉन्च कर दिया है। इसका मुख्य उद्देश्य संस्थाओं को AI-जेनरेटेड कंटेंट जैसे फोटो, वीडियो और ऑडियो की पहचान करने में मदद करना है। जैसे-जैसे डीपफेक तकनीक खतरनाक होती जा रही है, फाइनेंशियल और HR टीमें कॉर्पोरेट फ्रॉड के बढ़ते खतरों से जूझ रही हैं। यह टूल डिजिटल फाइलों को स्कैन करके उनमें छिपे उन वॉटरमार्क्स को ढूंढता है, जिन्हें साधारण फॉरेंसिक टूल्स नहीं पकड़ पाते।
भारतीय बिजनेस पर असर
भारतीय कंपनियों के लिए, खासकर बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर में, यह साइबर सुरक्षा की दिशा में एक अहम कदम है। यह टूल संदिग्ध फाइलों को स्क्रीन करने के लिए एक 'फर्स्ट-लाइन डिफेंस' का काम करता है। यह टूल HEIC, JPEG, MP3 और WAV जैसे कई फॉर्मेट्स को सपोर्ट करता है।
तकनीकी सीमाएं और जोखिम
फिलहाल यह टूल OpenAI, NVIDIA और Kakao जैसे प्लेटफॉर्म्स द्वारा बनाए गए वॉटरमार्क्स को पहचान सकता है, लेकिन Meta या Microsoft जैसे प्लेटफॉर्म्स द्वारा बनाए गए कंटेंट को यह अभी नहीं पढ़ पा रहा है। साथ ही, अगर किसी फाइल को बहुत ज्यादा कंप्रेस (Compress) किया गया है, तो यह टूल उसे चेक नहीं कर सकता।
विशेषज्ञों का कहना है कि इसे एक 'प्रोबेबिलिस्टिक फिल्टर' ही मानें। अगर टूल यह बताता है कि फाइल AI-जेनरेटेड है, तो वह पक्का है, लेकिन अगर यह कुछ नहीं पकड़ पाता, तो भी इसका मतलब यह नहीं है कि फाइल असली है। इसलिए, कंपनियों को अभी भी संवेदनशील ट्रांजेक्शन के लिए मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन और ह्यूमन वेरिफिकेशन पर ही भरोसा करना चाहिए। निवेश की नजर से देखें तो कंपनियों का साइबर सिक्योरिटी पर खर्च आने वाले समय में बढ़ना तय है।
