Blind के एक हालिया सर्वे के अनुसार, भारत में काम कर रहे **44%** टेक प्रोफेशनल्स के पास हायरिंग और ले-ऑफ जैसे फैसलों का अधिकार नहीं है। इन बड़े मल्टीनेशनल कंपनियों में फैसले विदेश में बैठे हेडक्वार्टर से लिए जाते हैं, जो निवेशकों के लिए कंपनी की ऑपरेशनल स्ट्रैटेजी और कॉस्ट एफिशिएंसी को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
भारत में मौजूद कई ग्लोबल टेक्नोलॉजी कंपनियों का कामकाज विदेशी हेडक्वार्टर से संचालित होता है। ब्लाइंड (Blind) प्लेटफॉर्म द्वारा किए गए 1,467 प्रोफेशनल्स के सर्वे से पता चलता है कि लगभग 44% भारतीय कर्मचारियों के पास हायरिंग या ले-ऑफ जैसे अहम फैसलों में कोई स्थानीय अधिकार (Local Authority) नहीं है। यह केंद्रीकृत ढांचा यह दिखाता है कि भारत में काम करने वाले आधे से ज्यादा कर्मचारियों के करियर से जुड़े फैसले स्थानीय नेतृत्व के बजाय ग्लोबल रणनीति के तहत लिए जाते हैं।
कंपनियों में पावर का अंतर
कंपनियों के बीच स्वायत्तता (Autonomy) को लेकर काफी अंतर देखने को मिला है। PayPal, Salesforce और Visa जैसी कंपनियों में 58% से 65% कर्मचारियों ने माना कि वर्कफोर्स से जुड़े फैसले पूरी तरह विदेशी दफ्तरों से लिए जाते हैं। इसके उलट, Amazon और Qualcomm जैसी कंपनियां अपनी स्थानीय टीमों को ज्यादा आजादी देती हैं, जहां केवल 25% कर्मचारियों ने ही ग्लोबल हेडक्वार्टर के दखल की बात कही है।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
कंपनियों का यह मैट्रिक्स मैनेजमेंट स्ट्रक्चर ग्लोबल कॉस्ट एफिशिएंसी को प्राथमिकता देता है। जब स्थानीय लीडरशिप के पास पावर नहीं होती, तो कंपनियां आर्थिक सुस्ती के दौरान आसानी से ग्लोबल स्तर पर बड़े पैमाने पर ले-ऑफ जैसे कठोर फैसले ले सकती हैं, जैसा कि Oracle के मामले में देखा गया था। इसका सीधा असर भारत के ऑपरेशन्स पर पड़ता है। हालांकि, यह मॉडल खर्चों को नियंत्रित करने में मदद करता है, लेकिन इससे टैलेंट रिटेंशन और स्थानीय बाजार की जरूरतों को तेजी से समझने में चुनौती भी आ सकती है। भविष्य के फाइनेंशियल रिजल्ट्स में यह देखना दिलचस्प होगा कि ये कंपनियां कैसे अपने ग्लोबल कंट्रोल और भारतीय टैलेंट के बीच तालमेल बिठाती हैं।
