ग्लोबल सेमीकंडक्टर दिग्गज अब जनरल-परपज प्रोसेसर से हटकर AI-ऑप्टिमाइज्ड कस्टम चिप्स की ओर बढ़ रहे हैं। ट्रेडिशनल ट्रांजिस्टर स्केलिंग की अपनी लिमिट्स के चलते यह बदलाव आ रहा है। भारत के लिए यह एक बड़ा मौका है, जहां **₹1,27,500 करोड़** के Semicon 2.0 मिशन के जरिए डिजाइन और पैकेजिंग इकोसिस्टम को मजबूत किया जा रहा है।
सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। दशकों से चला आ रहा 'मूर का नियम' (Moore's Law), जिसके तहत ट्रांजिस्टर का आकार छोटा कर परफॉरमेंस बढ़ाई जाती थी, अब अपनी भौतिक सीमाओं तक पहुंच गया है। अब बड़ी टेक कंपनियां और डेटा सेंटर ऑपरेटर ट्रेडिशनल प्रोसेसर्स की जगह कस्टम-बिल्ट सिलिकॉन यानी ASICs (Application-specific integrated circuits) पर दांव लगा रहे हैं।
कस्टम सिलिकॉन और एनर्जी एफिशिएंसी
ट्रांजिस्टर स्केलिंग के बिना भी बेहतर परफॉरमेंस के लिए अब चिपलेट्स और 3D पैकेजिंग का सहारा लिया जा रहा है। इसमें लॉजिक और मेमोरी को वर्टिकली स्टैक किया जाता है, जिससे बिजली की खपत और गर्मी कम होती है। इस बदलाव ने डेटा सेंटर्स को एयर कूलिंग से लिक्विड कूलिंग सिस्टम की ओर शिफ्ट होने पर मजबूर कर दिया है। कंपनियां अब सप्लाई चेन के झंझटों से बचने के लिए खुद ही चिप डिजाइनिंग कर रही हैं।
भारत की रणनीतिक भूमिका
सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में भारत एक ग्लोबल हब बनकर उभर रहा है। सरकार के ₹1,27,500 करोड़ के Semicon 2.0 मिशन का फोकस हाई-कॉम्प्लेक्सिटी डिजाइन, एडवांस्ड पैकेजिंग और मैन्युफैक्चरिंग पर है। दुनिया का 20% सेमीकंडक्टर डिजाइन टैलेंट भारत में है, जो Micron, Applied Materials और Lam Research जैसी कंपनियों को आकर्षित कर रहा है। अनुमान है कि 2026 तक सेमीकंडक्टर मार्केट $1.5 ट्रिलियन का हो जाएगा, जिसमें भारत बड़ी हिस्सेदारी देख रहा है।
जोखिम और सप्लाई बॉटलनेक्स
इस ग्रोथ के बीच कुछ चुनौतियां भी हैं। एडवांस्ड पैकेजिंग, जैसे CoWoS, फिलहाल प्रोडक्शन के लिए सबसे बड़ी बाधा (bottleneck) बनी हुई है। यदि कैपेसिटी नहीं बढ़ाई गई, तो AI प्रोडक्ट्स की लॉन्चिंग में देरी हो सकती है। इसके अलावा, जियो-पॉलिटिकल तनाव और बढ़ती बिजली की मांग भी बड़ी बाधाएं हैं। निवेशकों को सलाह है कि वे कंपनियों के पैकेजिंग कैपेसिटी अपडेट्स और सप्लाई चेन स्टेबिलिटी पर कड़ी नजर रखें।
