AI सेक्टर में बुनियादी ढांचे पर भारी-भरकम खर्च हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि साल 2031 तक इस सेक्टर को **$6 ट्रिलियन** का रेवेन्यू हासिल करना होगा, ताकि किए गए निवेश को सही ठहराया जा सके।
खर्च बनाम कमाई का अंतर
टेक्नोलॉजी सेक्टर में फिलहाल कैपिटल स्पेंडिंग की एक ऐसी लहर है, जिसने रेवेन्यू ग्रोथ को पीछे छोड़ दिया है। Microsoft, Alphabet, Amazon, Meta और Oracle जैसी दिग्गज कंपनियां साल 2026 तक AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर $780 बिलियन खर्च करने की राह पर हैं। पिछले 3 साल में यह खर्च 5 गुना बढ़ा है। अगर इंडस्ट्री सिर्फ मौजूदा सॉफ्टवेयर और सब्सक्रिप्शन मॉडल पर निर्भर रही, तो $4.2 ट्रिलियन का रेवेन्यू शॉर्टफॉल देखने को मिल सकता है।
हार्डवेयर बनाम सॉफ्टवेयर
साल 2020 से 2026 के बीच हार्डवेयर और सेमीकंडक्टर कंपनियों ने 24% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) दर्ज की है, जबकि सॉफ्टवेयर सेक्टर की ग्रोथ महज 6% रही। इसका सीधा मतलब है कि फिलहाल फायदा उन्हें मिल रहा है जो AI की नींव (हार्डवेयर) बना रहे हैं, न कि उन्हें जो इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
भारतीय IT सेक्टर पर असर
भारत की बड़ी IT कंपनियां अब ग्लोबल क्लाइंट्स के लिए 'इंटीग्रेटर' की भूमिका निभा रही हैं। जोखिम यह है कि क्या ये कंपनियां छोटे पायलट प्रोजेक्ट्स से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर ऑर्गेनाइजेशनल रिस्ट्रक्चरिंग में मदद कर पाएंगी।
निवेशकों के लिए अहम मीटर
निवेशकों को इन 3 पहलुओं पर नजर रखनी चाहिए:
- ROIC (Return on Invested Capital): बड़ी टेक कंपनियां अपने खर्च को मुनाफे में कितनी कुशलता से बदल रही हैं?
- Profit Margins: सॉफ्टवेयर कंपनियां क्या सब्सक्रिप्शन से इतर कमाई के नए तरीके ढूंढ पा रही हैं?
- Deal Pipeline: भारतीय IT कंपनियों के पास बड़े AI प्रोजेक्ट्स का पाइपलाइन कितना मजबूत है।
