दुनिया भर की दिग्गज टेक कंपनियां AI इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए भारी मात्रा में कर्ज और जटिल जॉइंट वेंचर्स का सहारा ले रही हैं। साल **2030** तक **$2 ट्रिलियन** कैश फ्लो का लक्ष्य **27%** सालाना ग्रोथ रेट पर टिका है, जिस पर अब सवाल उठने लगे हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की रेस में टिके रहने के लिए टेक कंपनियां अब सिर्फ अपने कैश रिजर्व पर निर्भर नहीं हैं। डेटा सेंटर्स बनाने के लिए तेजी से कर्ज का इस्तेमाल बढ़ रहा है। मार्केट में बहस इस बात पर है कि क्या यह भारी-भरकम निवेश साल 2030 तक अनुमानित $2 ट्रिलियन का ऑपरेटिंग कैश फ्लो दे पाएगा, जिसके लिए 27% की सालाना ग्रोथ रेट अनिवार्य है।
शैडो बॉरोइंग का बढ़ता ट्रेंड
एक चिंताजनक ट्रेंड यह है कि कंपनियां प्रोजेक्ट्स का पूरा खर्च अपनी बैलेंस शीट पर नहीं दिखा रही हैं। इसके बजाय, वे प्राइवेट लेंडर्स के साथ जॉइंट वेंचर्स का इस्तेमाल कर रही हैं, जिसे 'शैडो बॉरोइंग' कहा जाता है। इससे आधिकारिक कर्ज के आंकड़े तो कम दिखते हैं, लेकिन यह जटिल वित्तीय जाल निवेशकों के लिए ट्रैक करना मुश्किल है। Bank for International Settlements (BIS) ने इसे एक बड़ा सिस्टमैटिक रिस्क बताया है।
फीडबैक लूप का खतरा
रेगुलेटर्स एक सर्कुलर स्पेंडिंग पैटर्न पर भी नजर रख रहे हैं। बड़ी क्लाउड कंपनियां AI स्टार्टअप्स में निवेश करती हैं और वही स्टार्टअप्स उस पैसे का इस्तेमाल उन्हीं कंपनियों से कंप्यूटिंग पावर खरीदने के लिए करते हैं। यह एक 'फीडबैक लूप' बनाता है जिससे रेवेन्यू ग्रोथ असल से ज्यादा दिखती है। अगर वास्तविक कस्टमर्स की कमी रही, तो इसका असर पेंशन फंड्स और इंश्योरेंस कंपनियों पर पड़ सकता है।
बदलता बाजार का मूड
European Central Bank के डेटा के मुताबिक, लेंडर्स अब टेक कंपनियों को पैसा देने के लिए ऊंचे प्रीमियम यानी ज्यादा ब्याज दरें मांग रहे हैं। इसका मतलब है कि सस्ते कर्ज का दौर अब खत्म हो रहा है। निवेशकों को सलाह है कि वे कंपनी के विज्ञापित रेवेन्यू के बजाय यह देखें कि पैसा बाहरी ग्राहकों से आ रहा है या सिर्फ इंटरनल स्पेंडिंग लूप से।
