भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) ने फिस्कल ईयर 2027 की पहली तिमाही में अपनी हायरिंग स्ट्रैटेजी बदल दी है। अब बाहर से नई भर्तियां करने के बजाय, ये सेंटर्स अपने मौजूदा इंजीनियरों को AI और MLOps जैसी एडवांस भूमिकाओं में शिफ्ट कर रहे हैं।
AI और MLOps पर फोकस
भारत में काम कर रहे ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) ने फिस्कल ईयर 2027 की पहली तिमाही में अपनी हायरिंग की रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। बाहरी हायरिंग पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय, ये सेंटर्स अब अपने मौजूदा कर्मचारियों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की स्पेशलिस्ट भूमिकाओं में ट्रांसफर कर रहे हैं। डेटा साइंटिस्ट, क्लाउड इंजीनियर और डेटा इंजीनियर जैसे प्रोफेशनल्स को अब मॉडल ऑपरेशंस, एप्लाइड AI और प्लेटफॉर्म इंजीनियरिंग जैसी नई पोज़िशन्स पर लाया जा रहा है। यह बदलाव मुख्य रूप से बेंगलुरु में केंद्रित है, जिसके बाद हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के हब भी इस ट्रेंड का हिस्सा बन रहे हैं।
क्यों हो रहा है यह बदलाव?
इस कदम के पीछे का मुख्य कारण प्रोडक्शन-रेडी AI रोल्स में टैलेंट की भारी कमी है। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, मशीन लर्निंग ऑपरेशंस (MLOps) और AI इवैल्यूएशन जैसे स्पेशलाइज्ड कामों के लिए मार्केट में टैलेंट की काफी कमी है। वर्तमान में, नेक्स्ट-जेनरेशन टेक्नोलॉजी को अपनाने के लिए जितनी क्षमता की ज़रूरत है, वह 50% से 70% तक कम आंकी जा रही है। अपने इंटरनल टैलेंट को री-स्किल करके और प्रमोट करके, कंपनियां बाहरी हायरिंग की लंबी और समय लेने वाली प्रक्रिया से बच रही हैं, साथ ही अपने पास मौजूद इंस्टीट्यूशनल नॉलेज को भी बनाए रख रही हैं।
अनुभवी प्रोफेशनल्स की बढ़ती मांग
GCCs में टैलेंट की मांग लगातार अनुभवी प्रोफेशनल्स की ओर झुकी हुई है। Q1 FY27 में, कुल हायरिंग की ज़रूरत का लगभग 56% उन प्रोफेशनल्स से आया जिनके पास 4 से 12 साल का अनुभव था। यह पिछली तिमाही के 54% की तुलना में थोड़ी वृद्धि दर्शाता है। यह ट्रेंड उन मिड-लेवल प्रोफेशनल्स को प्राथमिकता देने की व्यापक पसंद को दर्शाता है, जिन्हें कम शुरुआती ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है और जो AI एजेंट डेवलपमेंट और प्लेटफॉर्म इंजीनियरिंग की तकनीकी मांगों को तेजी से अपना सकते हैं।
निवेशकों और सेक्टर के लिए मायने
भारतीय IT सर्विसेज और GCC इकोसिस्टम पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए, यह बदलाव हायर-वैल्यू सर्विस डिलीवरी की ओर एक कदम का संकेत देता है। GCCs भारत के टेक्नोलॉजी सेक्टर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो अक्सर ग्लोबल फर्मों की कैप्टिव यूनिट्स के तौर पर काम करते हैं। हालांकि इंटरनल री-स्किलिंग से बाहरी भर्ती की लागत कम हो सकती है, यह टेक्नोलॉजिकल प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए बढ़ते कॉम्पिटिटिव प्रेशर को भी उजागर करता है। इन स्किल गैप्स को पाटने में विफलता से प्रोजेक्ट्स में देरी हो सकती है या उन फर्मों के लिए कॉम्पिटिटिव एडवांटेज का नुकसान हो सकता है जो ग्लोबल ऑपरेशंस के लिए इन सेंटर्स पर निर्भर हैं। निवेशकों को यह ट्रैक करना पड़ सकता है कि ये सेंटर्स इस ट्रांजिशन को कितनी प्रभावी ढंग से मैनेज करते हैं और क्या इंटरनल मोबिलिटी पूरे फिस्कल ईयर के दौरान हाई-एंड AI सर्विस डिलीवरी के लिए आवश्यक ग्रोथ रेट को बनाए रख सकती है।
