Ethereum डेवलपर्स pERC-20 और Starknet के STRK20 जैसे नए प्राइवेसी फ्रेमवर्क ला रहे हैं। इनका मकसद ट्रांजैक्शन डेटा को छिपाना है, लेकिन ऑडिट की सुविधा भी बनी रहेगी। निवेशकों के लिए यह 'कंप्लायंस-फर्स्ट प्राइवेसी' की ओर एक बड़ा कदम हो सकता है, हालांकि रेगुलेटरी माहौल एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
क्या हुआ है?
Ethereum इकोसिस्टम में फाइनेंशियल प्राइवेसी को लेकर एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। pERC-20 और Starknet के STRK20 जैसे नए प्रोजेक्ट्स सामने आए हैं। आम तौर पर ब्लॉकचेन पर हर ट्रांजैक्शन और वॉलेट बैलेंस सार्वजनिक होता है, लेकिन ये नई टेक्नोलॉजीज जीरो-नॉलेज प्रूफ जैसी एडवांस्ड क्रिप्टोग्राफिक तकनीकों का इस्तेमाल करती हैं। इससे यूजर्स अपने बैलेंस और ट्रांजैक्शन डिटेल्स को 'शील्ड' कर सकते हैं, यानी छिपा सकते हैं। इसका मुख्य लक्ष्य प्राइवेट ट्रांसफर और डीसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस (DeFi) एक्टिविटीज़ को संभव बनाना है, बिना ऑडिट की क्षमता को पूरी तरह खत्म किए।
'कंप्लायंस-फर्स्ट प्राइवेसी' की ओर बढ़त
पहले, प्राइवेसी-केंद्रित क्रिप्टो प्रोजेक्ट्स को रेगुलेटर्स शक की निगाह से देखते थे। मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अवैध कामों से जुड़ा होने के डर से कई देशों में इन पर पाबंदी भी लगाई गई। Starknet के STRK20 जैसे नए Ethereum-आधारित डेवलपमेंट "मिक्सर" मॉडल से हटकर एक नया तरीका अपना रहे हैं। ये सिस्टम एसेट के फ्रेमवर्क में ही "व्यूइंग की" (viewing keys) को एम्बेड करते हैं। इस फीचर से ऑडिटर्स या रेगुलेटर्स को कानूनी मांग पर ट्रांजैक्शन हिस्ट्री दिखाई जा सकती है। डेवलपर्स का कहना है कि इससे यूजर्स को बैंक अकाउंट जैसी प्राइवेसी मिलेगी, लेकिन गलत लोग पूरी तरह गुमनाम रहकर छिप नहीं पाएंगे।
भारतीय रेगुलेटरी संदर्भ
भारतीय निवेशकों के लिए, इन नए मानकों और पुराने "प्राइवेसी कॉइन्स" के बीच का अंतर समझना बहुत जरूरी है। भारत की फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (FIU) और अन्य रेगुलेटरी बॉडीज ने पहले भी ऐसे क्रिप्टो एसेट्स के खिलाफ कड़ी चेतावनी जारी की है जो गुमनामी बढ़ाते हैं, क्योंकि वे मनी लॉन्ड्रिंग के लिए हाई-रिस्क माने जाते हैं। प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत, क्रिप्टो सर्विस प्रोवाइडर्स को सख्त KYC और AML स्टैंडर्ड्स का पालन करना होता है। कोई भी एसेट जो पूरी तरह से गुमनामी देता है, वह मौजूदा भारतीय रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में स्वीकार्य नहीं माना जाता। ऐसे में, यह देखना बड़ा सवाल है कि क्या ये नए "कंप्लाइंट" प्राइवेसी फ्रेमवर्क डोमेस्टिक प्लेटफॉर्म्स द्वारा स्वीकार किए जाएंगे या पुराने प्राइवेसी टोकन की तरह ही प्रतिबंधों का सामना करेंगे।
निवेशकों का नजरिया
इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स अक्सर पब्लिक ब्लॉकचेन पर प्राइवेसी की कमी को DeFi से दूर रहने का कारण बताते हैं। उन्हें डर होता है कि उनके कॉम्पिटिटर्स उनकी ट्रेडिंग स्ट्रेटेजीज़ या फंड्स की रियल-टाइम ट्रैकिंग कर सकते हैं। अगर ये नए स्टैंडर्ड्स सफल होते हैं, तो वे इस खाई को पाट सकते हैं, जिससे डीसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस प्रोफेशनल कैपिटल के लिए अधिक आकर्षक हो सकता है। हालांकि, यह टेक्नोलॉजी अभी शुरुआती दौर में है। इसमें सिर्फ टेक्निकल ही नहीं, बल्कि रेगुलेटरी रिस्क भी बड़ा है। कंप्लायंस फीचर्स होने के बावजूद, रेगुलेटर्स "देखें और इंतजार करें" की नीति अपना सकते हैं। एक और चुनौती एडॉप्शन की है - अगर बड़े एक्सचेंजेस, जो लिक्विडिटी के गेटकीपर हैं, कंप्लायंस के डर से इन एसेट्स को लिस्ट नहीं करते हैं, तो इनकी उपयोगिता सीमित हो सकती है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
इस स्पेस को ट्रैक कर रहे निवेशकों को तीन मुख्य बातों पर नजर रखनी चाहिए। पहला, यह देखें कि प्रमुख सेंट्रलाइज्ड एक्सचेंजेस और लिक्विडिटी प्रोवाइडर्स इन प्राइवेसी स्टैंडर्ड्स पर बने टोकन्स के प्रति कैसा रवैया अपनाते हैं। उनका समर्थन या इनकार एसेट की व्यवहार्यता के लिए एक बड़ा संकेत होगा। दूसरा, वैश्विक और स्थानीय रेगुलेटर्स के रुख पर ध्यान दें; "कंप्लायंस-रेडी" प्राइवेसी टेक पर आधिकारिक गाइडेंस इंडस्ट्री के दावों से ज्यादा अहमियत रखेगा। अंत में, इन प्रोटोकॉल्स के सिक्योरिटी ऑडिट्स पर नज़र रखें। किसी भी नई क्रिप्टोग्राफिक इम्प्लीमेंटेशन की तरह, बग्स या कमजोरियों से बड़ा वित्तीय नुकसान हो सकता है, इसलिए कोड ऑडिट्स और डेवलपमेंट टीम्स का ट्रैक रिकॉर्ड इस सेक्टर में किसी भी रुचि के लिए महत्वपूर्ण निगरानी बिंदु हैं।
