एस्टोनिया ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर उम्र की सीमा तय करने वाले यूरोपीय संघ के प्रस्तावित नियमों को चुनौती दी है। सरकार का तर्क है कि एज-बैन के बजाय, EU को 'डिजिटल सर्विसेज एक्ट' के तहत प्लेटफॉर्म्स के लत लगाने वाले डिजाइन को बदलने के लिए मजबूर करना चाहिए।
एज-बैन क्यों नहीं है समाधान?
यूरोपीय आयोग 16 सितंबर, 2026 को सोशल मीडिया के लिए अपनी नई पॉलिसी को अंतिम रूप दे सकता है। लेकिन एस्टोनिया सरकार का रुख इससे अलग है। एस्टोनिया की जस्टिस और डिजिटल अफेयर्स मिनिस्टर Liisa-Ly Pakosta ने स्पष्ट किया है कि केवल उम्र तय कर देने से समस्या हल नहीं होगी। उनका मानना है कि ऐसे प्रतिबंधों को आसानी से VPN जैसे टूल्स के जरिए तोड़ा जा सकता है। इसके अलावा, अनिवार्य एज वेरिफिकेशन सिस्टम यूजर्स की प्राइवेसी के लिए खतरा पैदा कर सकता है और मास सर्विलांस को बढ़ावा दे सकता है।
अब प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करने की मांग
एस्टोनिया अब 'डिजिटल सर्विसेज एक्ट' (DSA) के तहत सख्ती बरतने की मांग कर रहा है। उनका कहना है कि सुरक्षा की जिम्मेदारी अब यूजर्स के बजाय प्लेटफॉर्म ऑपरेटरों पर होनी चाहिए। सरकार चाहती है कि वर्तमान में जो गाइडलाइन्स स्वैच्छिक हैं, उन्हें कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाए ताकि कंपनियों को अपने ऐप्स का बेसिक आर्किटेक्चर बदलना पड़े।
टेक कंपनियों के लिए क्या हैं जोखिम?
अगर EU एस्टोनिया के सुझाव को मान लेता है, तो यह Meta, TikTok और अन्य बड़ी टेक कंपनियों के बिजनेस मॉडल पर सीधा हमला होगा। यदि कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से 'एडिक्टिव फीचर्स' (Addictive Features) को हटाना पड़ा, तो उन्हें भारी कंप्लायंस कॉस्ट का सामना करना पड़ेगा। साथ ही, उन्हें यूरोपीय मार्केट में बने रहने के लिए अपने प्रोडक्ट्स का पूरी तरह से रीडिजाइन करना पड़ सकता है। निवेशकों के लिए 16 सितंबर की घोषणा महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि इसी से साफ होगा कि EU का रुख केवल वेरिफिकेशन पर रहेगा या फिर प्रोडक्ट-लेवल के कठोर नियमों पर।
