गूगल के पूर्व CEO Eric Schmidt का मानना है कि AI टूल्स के आने से मैन्युअल कोडिंग का दौर खत्म हो रहा है। यह बदलाव उन भारतीय IT कंपनियों के लिए चुनौती है जो बड़े वर्कफोर्स पर निर्भर हैं। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि ये कंपनियां अपनी स्ट्रैटेजी को AI के हिसाब से कैसे बदलती हैं।
गूगल के पूर्व CEO Eric Schmidt ने हाल ही में कहा है कि मैन्युअल कोडिंग—जहां इंसान सॉफ्टवेयर की हर लाइन खुद लिखता है—अब खत्म होने की कगार पर है। भारतीय निवेशकों के लिए यह खबर काफी अहम है, क्योंकि यह देश के विशाल IT सर्विसेज सेक्टर के मूल बिजनेस मॉडल को सीधे प्रभावित करती है। Schmidt का तर्क है कि अब AI टूल्स कई जटिल कामों में इंसानी प्रोग्रामर्स से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, जिससे डेवलपर्स की भूमिका 'कोडिंग करने वाले' से बदलकर 'सिस्टम आर्किटेक्ट' की हो गई है।
इंडियन सर्विस मॉडल पर असर
दशकों से Tata Consultancy Services, Infosys, Wipro, और HCL Technologies जैसी भारतीय IT कंपनियां इंसानी टैलेंट को स्केल करने के मॉडल पर काम करती आई हैं। उनका बिजनेस मुख्य रूप से बड़ी संख्या में इंजीनियर्स को काम पर रखने पर आधारित है। Schmidt की चेतावनी यह संकेत देती है कि यदि AI सॉफ्टवेयर लिखने का काम संभाल लेता है, तो 'बड़ी वर्कफोर्स' का वैल्यू प्रपोजिशन दबाव में आ सकता है।
अगर AI सॉफ्टवेयर बनाने में लगने वाले समय और खर्च को कम करता है, तो कंपनियों को अपना फोकस बदलना होगा। इंडस्ट्री अब एक ऐसे स्ट्रक्चर की ओर बढ़ रही है जहां इंसानी डेवलपर्स सुपरवाइजर की तरह काम करेंगे। वे कोड लिखने के बजाय AI को मॉनिटर करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि आउटपुट सुरक्षित और क्लाइंट की जरूरतों के हिसाब से हो। यह केवल टेक्नोलॉजी का बदलाव नहीं है, बल्कि यह भी है कि कंपनियां अपना रेवेन्यू कैसे जेनरेट करती हैं और मार्जिन को कैसे प्रोटेक्ट करती हैं।
रिस्क और मार्केट चुनौतियां
AI के दौर में शिफ्ट होने से IT सेक्टर के सामने कई रिस्क भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती 'मास री-स्किलिंग' की है। यदि कोडिंग के सामान्य काम ऑटोमेट हो जाते हैं, तो कंपनियों को अपने जूनियर इंजीनियर्स को जल्दी से उच्च-स्तरीय आर्किटेक्चरल वर्क के लिए ट्रेन करना होगा। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते हैं, तो उनकी प्रोडक्टिविटी पर असर पड़ सकता है और वे उन नई AI-नेटिव कंपनियों से पिछड़ सकते हैं जिनके पास पुराने बिजनेस मॉडल का बोझ नहीं है।
इसके अलावा, प्राइसिंग प्रेशर का भी खतरा है। क्लाइंट्स यह मांग कर सकते हैं कि कंपनियां अपनी सर्विस सस्ती करें क्योंकि अब AI से काम तेज और सस्ता हो रहा है। भारतीय IT फर्मों को यह साबित करना होगा कि वे केवल बिल योग्य घंटों (billable hours) के लिए कोडिंग नहीं कर रही हैं, बल्कि आर्किटेक्चरल सुपरविजन के जरिए वैल्यू भी दे रही हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों के लिए आने वाली तिमाहियों में यह देखना अहम होगा कि ये IT कंपनियां अपनी बिजनेस स्ट्रैटेजी कैसे बदलती हैं। खास तौर पर मैनेजमेंट की AI अडॉप्शन पर कमेंट्री, कर्मचारियों की री-स्किलिंग पर आने वाला खर्च और यह देखना जरूरी होगा कि क्या कंपनियां नए AI टूल्स को अपनाकर भी अपने ऑपरेटिंग मार्जिन को मेंटेन कर पा रही हैं।
