साल 2026 में Enterprise AI का दौर एक नए मोड़ पर है। अब कंपनियां सिर्फ एक्सपेरिमेंट पर पैसा नहीं लुटा रही हैं, बल्कि उनका पूरा ध्यान 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट' (ROI) पर है। इंफ्रेंस (Inference) की बढ़ती लागत के चलते अब बड़ी कंपनियों का फोकस पावरफुल मॉडल के बजाय छोटे और किफायती मॉडल्स पर है, जिसका सीधा असर TCS, Infosys और HCLTech जैसी आईटी कंपनियों के क्लाइंट कॉन्ट्रैक्ट्स पर पड़ रहा है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर शुरूआती दौर का उत्साह अब जमीनी हकीकत में बदल रहा है। 2026 के अंत तक, कॉरपोरेट लीडर्स 'किसी भी कीमत पर प्रयोग' करने की रणनीति से बाहर निकलकर वित्तीय जवाबदेही (Financial Accountability) और ठोस बिजनेस नतीजों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
क्यों बदल रही है रणनीति?
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह AI ऑपरेशन्स की बढ़ती लागत है। शुरुआती दौर में ट्रेनिंग पर खर्च हुआ, लेकिन अब असली चुनौती 'इंफ्रेंस' (Inference) की है, यानी AI मॉडल को काम पर लगाने का खर्चा। कंपनियों के एजेंटिक वर्कफ्लो और डेटा प्रोसेसिंग के कारण इंफ्रास्ट्रक्चर कॉस्ट उम्मीद से कहीं ज्यादा बढ़ गई है, जिससे CFOs अब AI खर्च और मुनाफे के बीच एक स्पष्ट कनेक्शन की मांग कर रहे हैं।
AI आर्किटेक्चर में बदलाव
बजट और परफॉर्मेंस का संतुलन बनाने के लिए आईटी दिग्गज अब 'टियर-बेस्ड' स्ट्रैटेजी अपना रहे हैं। महंगे और बड़े Large Language Models (LLMs) के बजाय, कंपनियां अब छोटे और स्पेशलाइज्ड Small Language Models (SLMs) का मिश्रण इस्तेमाल कर रही हैं।
इस बदलते माहौल में कंपनियों की एप्रोच भी अलग है:
- TCS और HCLTech: ये कंपनियां फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर्स में निवेश कर रही हैं ताकि क्लाइंट्स को एक सिक्योर और स्टेबल एनवायरनमेंट मिल सके।
- Infosys: इंफोसिस 'एसेट-लाइट' मॉडल पर कायम है, जहां वे अपने 'Topaz Fabric' जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए ऑटोमेशन और कॉस्ट-एफिशिएंसी पर जोर दे रहे हैं।
ROI का गैप और नया कॉन्ट्रैक्ट मॉडल
इंडस्ट्री के आंकड़े बताते हैं कि हालांकि 90% कंपनियां AI अपना चुकी हैं, लेकिन केवल 37% ही इसे EBIT (मुनाफे) में तब्दील कर पाई हैं। इसी वजह से आईटी कंपनियां अब 'आवरली रेट' वाले पुराने मॉडल से हटकर 'आउटकम-बेस्ड' फीस मॉडल की ओर बढ़ रही हैं। यानी, अगर AI से उत्पादकता (Productivity) बढ़ती है, तभी रेवेन्यू का फायदा होगा।
निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
निवेशकों को अब कंपनियों के मार्जिन्स पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। अनियंत्रित इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और हार्डवेयर की कमी प्रॉफिटेबिलिटी को प्रभावित कर सकती है। आगामी तिमाही नतीजों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह 'आउटकम-बेस्ड' मॉडल कंपनियों के मार्जिन्स को बचाने में कामयाब रहता है या यह प्रोजेक्ट्स में देरी का कारण बनता है।
