DoT के नए SIM-बाइंडिंग नियम को लेकर भारतीय छोटे व्यवसायों में भारी हलचल है। रिपोर्ट के अनुसार, यह नियम न केवल ऑपरेटिंग खर्च बढ़ा सकता है, बल्कि मल्टी-डिवाइस कनेक्टिविटी पर निर्भर कंपनियों के कामकाज में भी बड़ी बाधा पैदा कर सकता है।
नियम का विरोध क्यों?
डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशंस (DoT) के मैसेजिंग अकाउंट्स को एक सिंगल रजिस्टर्ड सिम से लिंक करने के निर्देश ने इंडस्ट्री की चिंता बढ़ा दी है। Esya Centre की हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह नीति भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए बड़ा 'ऑपरेशनल बॉटलनेक' साबित हो सकती है। ज्यादातर छोटी कंपनियां अपने कस्टमर सपोर्ट और लॉजिस्टिक्स के लिए मल्टी-डिवाइस एक्सेस पर निर्भर हैं, जिसे यह नियम पूरी तरह से बाधित कर सकता है।
क्या है फाइनेंशियल रिस्क?
निवेशकों और बिजनेस मालिकों के लिए सबसे बड़ी चिंता बढ़ती लागत है। सर्वे में शामिल 76% व्यवसायों का मानना है कि इस नियम से उन पर वित्तीय बोझ पड़ेगा। अनुपालन (Compliance) सुनिश्चित करने के लिए उन्हें नए इक्विपमेंट्स खरीदने या अधिक स्टाफ रखने की जरूरत पड़ सकती है। चूंकि छोटी कंपनियों का प्रॉफिट मार्जिन पहले से ही काफी कम होता है, ऐसे में यह अतिरिक्त खर्च उनकी फाइनेंशियल फ्लेक्सिबिलिटी को प्रभावित करेगा।
साइबर सुरक्षा पर सवालिया निशान
सरकार का दावा है कि यह कदम साइबर-फ्रॉड रोकने के लिए है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। सर्वे में केवल 19% बिजनेस मालिकों को लगता है कि इससे डिजिटल सुरक्षा में कोई बड़ा सुधार आएगा। विशेषज्ञों का तर्क है कि आधुनिक साइबर-खतरे और मालवेयर जैसी समस्याएं ट्रेडिशनल सिम-बेस्ड वेरिफिकेशन को आसानी से चकमा दे देती हैं।
आगे की राह
Esya Centre ने DoT को सुझाव दिया है कि वे 'रिस्क-बेस्ड' अप्रोच अपनाएं। म्यूट अकाउंट्स पर सीधे निशाना साधने और KYC प्रोसेस को मजबूत करने जैसे कदम अधिक प्रभावी हो सकते हैं। मार्केट के जानकारों की नजर अब इस बात पर है कि क्या सरकार इस फीडबैक पर विचार करती है या कंपनियों को इस नए बदलाव के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
