भारत का डेटा सेंटर उद्योग अब मुंबई-चेन्नई जैसे पारंपरिक शहरों से आगे बढ़कर हैदराबाद और पुणे जैसे नए इलाकों में फैल रहा है। इसका मुख्य कारण AI के लिए चाहिए भारी बिजली की खपत है। जहां **2047** तक सरकारी टैक्स छूट का फायदा मिलेगा, वहीं निवेशकों को पानी की किल्लत और बढ़ते कर्ज जैसे जोखिमों पर नजर रखनी होगी।
AI ने कैसे बदली साइट सिलेक्शन की रणनीति?
सालों तक भारत का डेटा सेंटर मार्केट सिर्फ मुंबई और चेन्नई तक सीमित था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। नई पीढ़ी के AI वर्कलोड के लिए अब सामान्य क्लाउड कंप्यूटिंग से कहीं ज्यादा बिजली की जरूरत है। आज के AI-रेडी डेटा सेंटर्स को 25 किलोवाट प्रति वर्ग मीटर से अधिक की फ्लोर लोडिंग कैपेसिटी चाहिए। मुंबई जैसे पुराने हब में ग्रिड की बाधाओं के कारण इतनी बिजली जुटाना महंगा और समय लेने वाला हो गया है, इसलिए अब ऑपरेटर्स उन जगहों को चुन रहे हैं जहां ग्रिड ज्यादा सक्षम है।
सरकारी पॉलिसी और मार्केट का उत्साह
सरकार ने इस सेक्टर को बूस्ट देने के लिए 2047 तक टैक्स हॉलिडे की घोषणा की है, जिससे विदेशी क्लाउड कंपनियों का भारत की ओर रुझान बढ़ा है। इसका असर बाजार पर भी दिखा है; पावर, डेटा सेंटर हार्डवेयर और सेमीकंडक्टर से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में साल 2026 में औसतन 60% की जोरदार तेजी देखने को मिली है।
रिस्क फैक्टर और चुनौतियां
तेजी के साथ-साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। डेटा सेंटर बनाना एक कैपिटल-इंटेंसिव बिजनेस है, जिसके लिए कंपनियां भारी कर्ज ले रही हैं। इसके अलावा, पर्यावरण संबंधी चिंताएं भी बढ़ रही हैं। कूलिंग के लिए पानी की भारी खपत के चलते ठाणे और विशाखापत्तनम जैसे इलाकों में स्थानीय स्तर पर विरोध के स्वर उठे हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि सरकार की मंजूरी तो मिल रही है, लेकिन जमीन पर फाइबर कनेक्टिविटी और बिजली ग्रिड की उपलब्धता में भारी अंतर (Gap) है, जिससे प्रोजेक्ट्स में देरी हो सकती है। निवेशकों को आने वाले समय में इन बुनियादी ढांचा चुनौतियों और कर्ज प्रबंधन पर कड़ी नजर रखनी होगी।
