आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती मांग के बीच ग्लोबल डेटा सेंटर खर्च **2028** तक **$2.1 ट्रिलियन** के स्तर तक पहुंचने का अनुमान है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर बदलाव भारतीय पावर, कूलिंग और इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनियों के लिए एक बड़ा अवसर पैदा कर रहा है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की नई डिमांड
Bank of America की हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया भर में डेटा सेंटर्स का निर्माण एक नए और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर चक्र की शुरुआत है। अब सारा फोकस केवल चिप मेकर्स पर नहीं, बल्कि उस फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर है जो इन सुपर-कंप्यूटिंग सिस्टम को घर और पावर देता है।
भारतीय कंपनियों के लिए मौके
नए दौर के इन 'नियो-क्लाउड' डेटा सेंटर्स को सामान्य सर्वर स्टोरेज की तुलना में कहीं अधिक पावर और कूलिंग की जरूरत है। भारत में भी बड़े कॉरपोरेट्स और ग्लोबल क्लाउड ऑपरेटर्स अपना जाल फैला रहे हैं, जिससे स्थानीय सप्लायर्स की चांदी हो रही है। खासकर जो कंपनियां:
- स्विचगियर (Switchgear)
- बड़े जनरेटर (Backup Generators)
- इलेक्ट्रिकल ट्रांसफॉर्मर
- प्रिसिजन HVAC कूलिंग सिस्टम
बनाती हैं, उन्हें लंबी अवधि के बड़े कांट्रैक्ट मिलने की उम्मीद है।
जोखिम और सतर्कता
मुनाफे की इस दौड़ में निवेशकों को आंखें बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए। इस सेक्टर में तीन बड़े रिस्क हैं:
- हाई लेवरेज: ये प्रोजेक्ट्स भारी कर्ज पर निर्भर होते हैं, इसलिए कंपनियों की बैलेंस शीट पर बढ़ते कर्ज (Debt) और ब्याज दरों के असर पर नजर रखें।
- पावर सप्लाई: डेटा सेंटर बिजली के बहुत बड़े उपभोक्ता हैं। ग्रिड कनेक्शन की कमी से काम में देरी हो सकती है, जो सीधे रेवेन्यू पर असर डालेगी।
- ग्रीन एनर्जी प्रेशर: अब कंपनियां ऐसे सप्लायर्स को प्राथमिकता दे रही हैं जो ऊर्जा-कुशल (Energy-efficient) समाधान दे सकें। पुरानी टेक्नोलॉजी वाली कंपनियों के लिए आगे चलकर टिकना मुश्किल हो सकता है।
निवेशकों को सलाह है कि वे कंपनी के ऑर्डर बुक ग्रोथ और समय पर प्रोजेक्ट पूरा करने की क्षमता (Execution capability) को ट्रैक करें।
