साल **2026** तक ग्लोबल साइबर सिक्योरिटी खर्च **$248.9 बिलियन** तक पहुंचने का अनुमान है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि केवल **9%** अधिकारी ही इसे बिजनेस का स्टैबिलाइजर मानते हैं। यह रिएक्टिव अप्रोच शेयरधारकों के लिए बड़े फाइनेंशियल रिस्क पैदा कर रही है।
बोर्डरूम में क्यों है यह विरोधाभास?
दुनियाभर की कंपनियों के बोर्डरूम में डिजिटल सेफ्टी को लेकर एक बड़ी गलतफहमी बनी हुई है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (World Economic Forum) के अप्रैल 2026 के एक सर्वे से पता चलता है कि हालांकि 42% अधिकारी साइबर रिस्क के असर को समझते हैं, लेकिन केवल 9% ही सुरक्षा निवेश को बिजनेस की स्थिरता के लिए जरूरी मानते हैं। ज्यादातर कंपनियां साइबर बजट को तभी रिलीज करती हैं जब कोई बड़ा सिक्योरिटी ब्रीच या सिस्टम फेलियर हो जाता है।
निवेशकों के लिए छिपा हुआ खतरा
जब साइबर सुरक्षा को केवल एक 'IT बोझ' समझा जाता है, तो टेक्निकल टीम और लीडरशिप के बीच तालमेल की कमी से फैसले देरी से लिए जाते हैं। इससे कंपनियों का ऑपरेशन ठप होने का खतरा बढ़ जाता है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (National Stock Exchange of India) जैसे बड़े संस्थान पहले ही अपने रेगुलेटरी फाइलिंग में साइबर और AI-रिलेटेड खतरों को बड़ा रिस्क बता चुके हैं, जो भविष्य के फाइनेंशियल प्रदर्शन को प्रभावित कर सकते हैं।
अब क्या देखें निवेशक?
निवेशकों को अब उन कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जो डिजिटल रेजिस्टेंस को केवल लागत (Cost) नहीं, बल्कि एक एसेट की तरह देखती हैं। जैसे-जैसे ग्लोबल इकोनॉमी डिजिटल सिस्टम पर निर्भर होती जा रही है, किसी कंपनी की डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को सुरक्षित रखने की क्षमता उसकी रेवेन्यू ग्रोथ जितनी ही महत्वपूर्ण होती जा रही है। एआई-पावर्ड खतरों के दौर में, जो कंपनियां केवल रिएक्टिव फिक्स पर निर्भर हैं, वे सिस्टमैटिक डिसरप्शन का शिकार हो सकती हैं।
