कॉर्पोरेट जगत में अब AI के इस्तेमाल का तरीका बदल रहा है। कोडिंग एक्सपर्ट्स की जगह फाइनेंस, मार्केटिंग और HR जैसे डोमेन एक्सपर्ट्स पर ध्यान दिया जा रहा है, ताकि रोजमर्रा के कामकाज में प्रोडक्टिविटी बढ़ाई जा सके। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि कंपनियां डेटा सिक्योरिटी और ट्रेनिंग को कैसे मैनेज कर रही हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर कॉर्पोरेट कंपनियों का नजरिया पूरी तरह से बदल गया है। अब तक AI को सिर्फ सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स और मशीन लर्निंग एक्सपर्ट्स का काम माना जाता था, लेकिन अब कंपनियां समझ रही हैं कि असली प्रोडक्टिविटी तब आती है जब फाइनेंस, मार्केटिंग और ह्यूमन रिसोर्स जैसे नॉन-टेक्निकल विभाग अपने स्पेसिफिक काम में AI का इस्तेमाल करते हैं।
बदलाव की असली वजह
महंगे AI टूल्स खरीद लेना ही काफी नहीं है, जब तक कि कर्मचारियों के पास उसे इस्तेमाल करने का सही फ्रेमवर्क न हो। आज बड़ी चुनौती सॉफ्टवेयर चलाना नहीं, बल्कि काम के उन हिस्सों की पहचान करना है जहां ऑटोमेशन से वैल्यू मिल सके। एक फाइनेंस प्रोफेशनल बैलेंस शीट को एक डेवलपर से कहीं बेहतर समझता है, इसलिए उनके द्वारा किए गए AI के इस्तेमाल से नतीजे ज्यादा सटीक मिलते हैं।
निवेशकों के लिए नई रिस्क और मौके
जब नॉन-टेक्निकल विभाग AI की कमान संभालते हैं, तो डेटा प्राइवेसी, आउटपुट की सटीकता (Accuracy) और ऑटोमेटेड फैसलों में 'बायस' (Bias) जैसी चुनौतियां भी बढ़ जाती हैं। यदि कंपनियां अपने वर्कफोर्स को लगातार ट्रेनिंग नहीं देती हैं, तो सुरक्षा में चूक या गलत फैसलों का रिस्क बना रहता है।
भारतीय बाजार पर असर
भारतीय कंपनियां, जो बड़ी संख्या में सर्विस-बेस्ड वर्कफोर्स पर निर्भर हैं, इस बदलाव का बड़ा फायदा उठा सकती हैं। जो कंपनियां AI को एक अलग IT प्रोजेक्ट मानने के बजाय अपने मौजूदा वर्कफ्लो में पूरी तरह से ढाल लेंगी, उनकी एफिशिएंसी में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है। निवेशकों को यह ट्रैक करना चाहिए कि कंपनियां अपने इंटरनल ट्रेनिंग प्रोग्राम्स पर कितना खर्च कर रही हैं और कैसे वे डेटा सिक्योरिटी को कोर बिजनेस प्रोसेस का हिस्सा बना रही हैं।
