Northeastern University और Consumer Reports की एक हालिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि कनेक्टेड गाड़ियां बिना स्पष्ट सहमति के ड्राइवर का डेटा थर्ड-पार्टी टेक कंपनियों को बेच रही हैं। भारत में DPDP एक्ट जैसे सख्त कानूनों के बीच, यह ऑटो कंपनियों के लिए बड़े रेगुलेटरी और रेपुटेशनल रिस्क का कारण बन सकता है।
डेटा का खेल और प्राइवेसी का संकट
इस रिसर्च में 21 अलग-अलग मॉडल्स और 17 प्रमुख मैन्युफैक्चरर्स को शामिल किया गया था। जांच में पाया गया कि ये 'स्मार्ट' गाड़ियां आपकी सटीक लोकेशन और गाड़ी की पहचान (VIN) जैसी जानकारी मार्केटिंग नेटवर्क को भेज रही हैं। कंपनियों के लिए यह कमाई का एक नया जरिया है, लेकिन ग्राहकों का भरोसा टूटते ही ब्रांड वैल्यू को तगड़ा झटका लग सकता है।
निवेशकों के लिए रेगुलेटरी चुनौतियां
भारत में 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट' लागू होने के बाद कंपनियों की जिम्मेदारी बढ़ गई है। अगर कंपनियां डेटा शेयरिंग के नियमों का पालन नहीं करती हैं, तो उन्हें भारी पेनल्टी भरनी पड़ सकती है। इसके अलावा, डेटा को सुरक्षित रखने के लिए साइबर सिक्योरिटी और सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर पर होने वाला खर्च (Capital Spending) भी कंपनियों के मार्जिन पर असर डाल सकता है।
क्या है रास्ता?
Honda जैसी कुछ कंपनियों ने डेटा कलेक्शन के नियमों को सख्त किया है और पुरानी लोकेशन हिस्ट्री को डिलीट करना शुरू कर दिया है। निवेशकों को सलाह है कि वे तिमाही नतीजों के दौरान मैनेजमेंट की कमेंट्री पर गौर करें। भविष्य में वही ऑटो कंपनियां बाजार में टिकेंगी जो टेक्नोलॉजी के साथ-साथ डेटा प्राइवेसी (Privacy-by-design) पर भी भारी निवेश कर रही हैं।
