Chip और Mobile Hub के लिए ₹1.9 लाख करोड़ की मंजूरी, भारत बनेगा ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Chip और Mobile Hub के लिए ₹1.9 लाख करोड़ की मंजूरी, भारत बनेगा ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब!

सरकार ने 'सेमीकॉन 2.0' और नई मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के लिए ₹1.9 लाख करोड़ की मंजूरी दी है। इस कदम से 2031 तक भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन को बढ़ावा मिलेगा और इंपोर्ट पर निर्भरता कम होगी।

इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में भारत की बड़ी छलांग!

मोदी सरकार ने देश को ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय कैबिनेट ने 'सेमीकॉन 2.0' और एक नई मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के लिए ₹1.9 लाख करोड़ के भारी-भरकम पैकेज को हरी झंडी दे दी है। यह महत्वाकांक्षी योजना अगले 5 सालों यानी 2030-31 तक चलेगी, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत की इंपोर्ट पर निर्भरता को कम करना है।

सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का विस्तार

इस कुल आवंटन में से ₹1,27,500 करोड़ 'सेमीकॉन 2.0' प्रोग्राम के लिए होंगे। पिछली पहलों के विपरीत, जो मुख्य रूप से फैब्रिकेशन प्लांट लगाने पर केंद्रित थीं, यह नया प्रोग्राम सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन के हर पहलू को कवर करेगा। सरकार अब सेमीकंडक्टर मटेरियल, स्पेशल केमिकल्स और प्रोडक्शन इक्विपमेंट बनाने में भी फाइनेंशियल सपोर्ट देगी। खास बात यह है कि सरकार अब स्वदेशी चिप डिजाइन पर भी जोर देगी, जिसमें स्टार्टअप्स और लोकल इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी पर काम करने वाली कंपनियों को खास इंसेंटिव दिए जाएंगे। सरकार का लक्ष्य इस सपोर्ट से कुल ₹4 लाख करोड़ का निवेश आकर्षित करना और प्रोग्राम के अंत तक ₹2 लाख करोड़ के सेमीकंडक्टर प्रोडक्शन का लक्ष्य हासिल करना है।

मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में लोकल कंपोनेंट्स पर फोकस

बचे हुए ₹62,500 करोड़ मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के लिए आवंटित किए गए हैं, जो मौजूदा प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) फ्रेमवर्क की जगह लेगा। यह सरकार की पॉलिसी में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव दिखाता है। जहां पहले की स्कीम बड़ी-स्केल असेंबली को आकर्षित करने पर केंद्रित थी, वहीं नई पॉलिसी अब कंपोनेंट्स और सब-असेंबली की गहरी लोकल सोर्सिंग को प्राथमिकता देगी। कंपनियां अपनी बिक्री पर 2.25% से 5% तक के इंसेंटिव कमा सकती हैं, साथ ही लोकल मैन्युफैक्चर्ड पार्ट्स का उपयोग करने पर 1.5% तक का बोनस भी मिलेगा। इतना ही नहीं, जो भारतीय ब्रांड लोकल रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) को प्राथमिकता देंगे, उन्हें अतिरिक्त 3% इंसेंटिव दिया जाएगा।

निवेशकों के लिए क्या है खास?

निवेशकों के लिए, यह योजना भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स स्पेस में हायर-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग की ओर एक बड़ा बदलाव है। पहले, भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों को इंपोर्टेड कंपोनेंट्स की हाई कॉस्ट के कारण अपनी प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव झेलना पड़ता था। लोकल सोर्सिंग और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देकर, सरकार अगले 5 सालों में इन कंपनियों की कॉस्ट स्ट्रक्चर को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखती है। हालांकि, इस सेक्टर में एग्जीक्यूशन से जुड़े जोखिम भी हैं। सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन की जटिलता और टैलेंट डेवलपमेंट की भारी लागत कुछ प्रमुख चुनौतियां हैं। निवेशकों को यह ट्रैक करना होगा कि अलग-अलग कंपनियां अपने कैपिटल स्पेंडिंग को कैसे मैनेज करती हैं, क्योंकि इन कैपिटल-इंटेंसिव सेक्टर्स में बड़े पैमाने पर विस्तार से कर्ज और कैश फ्लो पर असर पड़ सकता है। साथ ही, इन कार्यक्रमों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या लोकल डिमांड और एक्सपोर्ट मार्केट बढ़ी हुई प्रोडक्शन कैपेसिटी को खपा पाते हैं। विस्तृत ऑपरेशनल गाइडलाइन्स जारी होने की गति और प्रोजेक्ट अप्रूवल की स्पीड पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

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