Bloomberg ने भारतीय सरकारी बॉन्ड मार्केट में विदेशी निवेशकों की पहुंच को आसान बनाने के लिए एक नया इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग सिस्टम लॉन्च किया है। यह प्लेटफॉर्म अब फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (Foreign Portfolio Investors) को सीधे Bloomberg Terminal के ज़रिए ट्रेडिंग करने की सुविधा देगा, जिससे घरेलू बाज़ार में लिक्विडिटी (Liquidity) और एफिशिएंसी (Efficiency) बढ़ने की उम्मीद है।
ग्लोबल मार्केट्स से जुड़ा भारत
पहले, विदेशी निवेशक भारतीय सरकारी बॉन्ड में ट्रेडिंग के लिए मैन्युअल और बिखरी हुई प्रक्रिया से गुजरते थे। अब Bloomberg के नए सिस्टम ने इसे इंटीग्रेट (Integrate) कर दिया है। यह प्लेटफॉर्म क्लीयरकॉर्प (Clearcorp) की सहायक कंपनी, क्लियरिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (Clearing Corporation of India) द्वारा मैनेज किए जाने वाले NDS-OM (Negotiated Dealing System-Order Matching) प्लेटफॉर्म से जुड़ता है। इसके ज़रिए अब ट्रेड का पूरा एग्जीक्यूशन (Execution) और सेटलमेंट (Settlement) हो सकेगा। मैन्युअल काम के कम होने से ट्रांजैक्शन एरर (Transaction Error) कम होंगे और ट्रेडिंग की स्पीड भी बढ़ेगी।
लिक्विडिटी और निवेशक फ्लो पर असर
जब किसी देश के बॉन्ड मार्केट को बड़े ग्लोबल इंडेक्स (Global Index) में शामिल करने की बात आती है, तो वहां आसानी से पहुंच एक अहम फैक्टर होता है। चूँकि भारत के सरकारी बॉन्ड पहले से ही J.P. Morgan Government Bond Index-Emerging Markets जैसे इंडेक्स का हिस्सा हैं, ऐसे प्लेटफॉर्म जो ट्रेडिंग को आसान बनाते हैं, वे लगातार विदेशी पूंजी प्रवाह (Capital Inflows) को बढ़ावा दे सकते हैं। एक स्मूथ ट्रेडिंग माहौल से इंटरनेशनल इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (International Institutional Investors) की भागीदारी बढ़ सकती है, जिससे सरकारी सिक्योरिटीज के सेकेंडरी मार्केट (Secondary Market) में बेहतर लिक्विडिटी आ सकती है।
निवेशकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें
यह टेक्नोलॉजी ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiency) को बढ़ाएगी। निवेशकों को बॉन्ड मार्केट को प्रभावित करने वाले मैक्रोइकोनॉमिक फैक्टर्स (Macroeconomic Factors) पर भी नज़र रखनी चाहिए। इनमें भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) की मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy), महंगाई (Inflation) की ट्रेंड्स और सरकार के फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) टारगेट्स शामिल हैं। इस नए ट्रेडिंग सिस्टम की प्रभावशीलता, प्लेटफॉर्म के ज़रिए होने वाले विदेशी ट्रेडों की मात्रा (Volume) और आगामी सरकारी सिक्योरिटीज की नीलामी (Auctions) में अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की भागीदारी दर से पता चलेगी।
