बेंगलुरु की IT और बायोटेक कंपनियों पर Karnataka Rakshana Vedike (KRV) का दबाव बढ़ गया है। 'आग्रह अभियान' के तहत ये कंपनियां अब वर्कर डेटा और लोकल हायरिंग को लेकर सवालों के घेरे में हैं, जिससे कंपनियों के कामकाज पर असर पड़ सकता है।
क्या है 'आग्रह अभियान'?
Karnataka Rakshana Vedike (KRV) ने 1 नवंबर, 2026 से बेंगलुरु में एक महीने लंबा 'आग्रह अभियान' शुरू किया है। इस अभियान का मकसद प्राइवेट सेक्टर की टेक्नोलॉजी और बायोटेक कंपनियों की भर्ती प्रक्रिया की बारीकी से जांच करना है। KRV के सदस्य सीधे कंपनियों के कैंपस में जाकर मेमोरेंडम दे रहे हैं, जिसमें पिछले 3 वर्षों का रिक्रूटमेंट ट्रेंड और वर्कफोर्स कंपोजिशन (कितने स्थानीय कर्मचारी हैं) जैसे डेटा की मांग की गई है।
कंपनियों के लिए बढ़ती चुनौतियां
निवेशकों और कंपनियों के लिए यह स्थिति HR और पब्लिक रिलेशंस के मोर्चे पर मुश्किलें खड़ी कर सकती है। मांगें सिर्फ हेडकाउंट तक सीमित नहीं हैं; ये संगठन भर्ती के मानदंड, भेदभाव की शिकायतों का निपटारा और स्थानीय कौशल विकास (skill development) जैसी जानकारी भी मांग रहे हैं। यदि भविष्य में इन मांगों को 'स्थानीय कोटा' के रूप में लागू करने का दबाव बढ़ता है, तो उन कंपनियों की ऑपरेशनल स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है जो दुनिया भर से टैलेंट हायर करती हैं।
सरकार का क्या है रुख?
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने इस मामले पर सतर्क रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि कंपनियों के खिलाफ किसी भी तरह की गुंडागर्दी या सीधे टकराव को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार ने कहा है कि रोजगार में भेदभाव से जुड़ी किसी भी शिकायत को सरकारी माध्यमों से ही सुलझाया जाना चाहिए, न कि निजी प्रवर्तन के जरिए।
निवेशकों के लिए संकेत
फिलहाल किसी भी बड़ी IT कंपनी ने इसके कारण किसी मटेरियल फाइनेंशियल नुकसान की सूचना नहीं दी है। हालांकि, निवेशक सरकारी बयानों और कंपनियों द्वारा हायरिंग पॉलिसी में किए गए किसी भी संभावित बदलाव पर नजर बनाए रखें। KRV नवंबर के अंत में जुटाई गई जानकारी को राज्य सरकार को सौंपने की योजना बना रहा है, जिसके बाद ही कोई औपचारिक नीतिगत बदलाव स्पष्ट हो पाएगा।
