US-बेस्ड स्पेस स्टार्टअप AstroForge अब 'Solo' नाम का एक AI कंट्रोल सिस्टम विकसित कर रहा है। इसके जरिए कंपनी बिना ग्राउंड टीम की मदद के अंतरिक्ष यान को नेविगेट करने की तैयारी में है। इस तकनीक का लक्ष्य भारी-भरकम ऑपरेशनल खर्च को कम करना है और साल 2027 में इसका बड़ा टेस्ट किया जाएगा।
स्पेस एक्सप्लोरेशन का काम अब तक बेहद महंगा और मैनपावर-इंटेंसिव रहा है, जहां हर सेकंड मिशन को मॉनिटर करने के लिए सैकड़ों ऑपरेटर्स की जरूरत होती है। हालांकि, कैलिफोर्निया की स्टार्टअप कंपनी AstroForge इस पुराने मॉडल को बदलने की राह पर है। कंपनी ग्राउंड कंट्रोल को रिप्लेस करने के लिए 'Solo' नामक एक प्रोप्रायटरी AI सिस्टम पर काम कर रही है। यह बदलाव मुख्य रूप से खर्च को कम करने के लिए किया जा रहा है, क्योंकि कंपनी के अनुमान के मुताबिक, एक समर्पित ग्राउंड नेटवर्क को बनाए रखने का खर्च $200 मिलियन से भी ज्यादा होता है।
पुरानी विफलताओं से सीखा सबक
स्वायत्तता (Autonomy) की ओर यह कदम कंपनी के पिछले मिशनों में आई चुनौतियों के बाद उठाया गया है। साल 2025 में, कंपनी के 'Odin' स्पेसक्राफ्ट को कम्युनिकेशन ब्लैकआउट का सामना करना पड़ा था, जिससे मिशन अधूरा रह गया। गहरे अंतरिक्ष में रेडियो ट्रांसमिशन की सीमित विंडो होती है, जिससे सिस्टम फेल होने पर दोबारा कंट्रोल पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। यह कमजोरी साबित करती है कि पूरी तरह से पृथ्वी-आधारित सपोर्ट पर निर्भर रहना कितना जोखिम भरा है।
कैसे काम करेगा Solo AI सिस्टम?
Solo सिस्टम को एक 'ऑनबोर्ड पायलट' की तरह डिजाइन किया गया है। यह जनरल AI नहीं है, बल्कि एक 'कंस्ट्रेंड ऑटोनॉमी' (Constrained Autonomy) सॉफ्टवेयर है। इसे 2,500 ऑनबोर्ड सेंसर्स से मिले डेटा पर ट्रेन किया गया है, ताकि यान बिजली के उतार-चढ़ाव या नेविगेशन में आई खराबी को खुद ही ठीक कर सके। इसका मकसद यान को इतना सक्षम बनाना है कि वह रेडियो संपर्क टूटने पर भी अपना काम जारी रख सके।
2027 में मिशन की असली परीक्षा
कंपनी अपनी इस तकनीक को चरणों में टेस्ट कर रही है। इसका पहला ट्रायल 'शैडो मोड' में होगा, जो 2026 के अंत में Intuitive Machines के साथ DeepSpace-2 व्हीकल पर लॉन्च होगा। असली अग्निपरीक्षा 2027 में 'Autonomy-1' मिशन के साथ होगी, जहां कंपनी बिना रेडियो कम्युनिकेशन के यान को पूरी तरह AI भरोसे छोड़ने की योजना बना रही है।
भारतीय स्पेस सेक्टर और ISRO जैसे संस्थानों के लिए भी यह एक बड़ा संकेत है। जहां भारत 'गगनयान' जैसे मिशनों के लिए ऑटोनॉमस नेविगेशन पर काम कर रहा है, वहीं प्राइवेट खिलाड़ियों का 'रेडियो-लेस' होने का दांव सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता पर एक बड़ा जुआ है। क्या यह AI गहरे अंतरिक्ष की अनपेक्षित चुनौतियों को इंसान की तरह सुलझा पाएगा? यह निवेश की नजर से देखने वाला सबसे बड़ा सवाल है।
