एशियाई बाजारों में, खासकर दक्षिण कोरिया और ताइवान में, AI की वजह से आई तूफानी तेजी के बाद अब गिरावट का दौर शुरू हो गया है। वहीं, भारत का निफ्टी 50 साल-दर-तारीख (YTD) प्रदर्शन में पिछड़ रहा है, जिसकी वजह विदेशी निवेशकों की बिकवाली और आईटी सेक्टर की चिंताएं हैं। निवेशक NSE पर नई क्लोजिंग ऑक्शन मैकेनिज्म लागू होने के बाद निफ्टी और BSE सेंसेक्स के बीच हालिया अंतर पर भी नजर रख रहे हैं।
AI की तेजी पर ब्रेक?
साल 2026 की शुरुआत में एशियाई बाजारों में AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के दम पर जो शानदार तेजी आई थी, उसमें अब नरमी के संकेत दिख रहे हैं। खासकर दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे प्रमुख सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी हब में जुलाई के महीने में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। ये मार्केट अपने साल-दर-तारीख के लगभग 50% के गेन के बाद अब कंसॉलिडेट कर रहे हैं। इस तेज गिरावट का असर TSMC, SK Hynix और Samsung Electronics जैसी ग्लोबल दिग्गज कंपनियों पर पड़ा है, जो AI-रेडी मेमोरी चिप्स की मांग के केंद्र में थीं।
भारत का मार्केट क्यों है पिछड़ा?
जहां एक ओर ये मार्केट तेज उछाल के बाद स्थिर हो रहे हैं, वहीं भारत का निफ्टी 50 इंडेक्स एक अलग राह पर चल रहा है। निफ्टी 2026 के ज्यादातर समय निगेटिव टेरेटरी में रहा है। भारत के इस अंडरपरफॉरमेंस की वजह कोई एक फैक्टर नहीं, बल्कि कई बातों का मिलाजुला असर है। साल की शुरुआत में ही डोमेस्टिक वैल्यूएशन्स काफी ऊंचे स्तर पर थे, जिससे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए ये दूसरे ग्लोबल मार्केट्स की तुलना में कम आकर्षक हो गए। इसके अलावा, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) की लगातार बिकवाली ने लार्ज-कैप स्टॉक्स पर दबाव बनाया है। साथ ही, भारत के विशाल IT सर्विसेज सेक्टर को लेकर एक स्ट्रक्चरल चिंता बनी हुई है। मार्केट पार्टिसिपेंट्स यह सवाल कर रहे हैं कि क्या जेनरेटिव AI भविष्य में पारंपरिक ह्यूमन-लेड सॉफ्टवेयर सर्विसेज की मांग को कम कर देगा।
निफ्टी और सेंसेक्स में क्यों दिख रहा अंतर?
भारतीय निवेशकों के लिए एक और अहम डेवलपमेंट यह है कि निफ्टी 50 और BSE सेंसेक्स के बीच हाल में अंतर देखा जा रहा है। 3 अगस्त, 2026 को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने एक नई क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) फ्रेमवर्क पेश किया। इस बदलाव से ट्रेडिंग डे के अंत में स्टॉक्स की फाइनल प्राइस कैसे तय होती है, इसमें फर्क आया। चूंकि BSE ने तुरंत इसी तरह का कोई मैकेनिज्म लागू नहीं किया, इसलिए दोनों इंडेक्स के डेली मूवमेंट्स में असामान्य अंतर देखने को मिला है। इसने रिटेल इन्वेस्टर्स के बीच मार्केट की असल दिशा को लेकर कन्फ्यूजन पैदा कर दिया है।
आगे क्या हैं ग्लोबल जोखिम?
आगे चलकर, ग्लोबल जोखिम अभी भी सेंटीमेंट पर भारी पड़ रहे हैं। जियोपॉलिटिकल अस्थिरता, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच का संघर्ष, एनर्जी प्राइसेस और मार्केट स्टेबिलिटी के लिए खतरा बना हुआ है। साथ ही, ग्लोबल एनालिस्ट्स बड़ी कॉरपोरेशन्स द्वारा किए जा रहे भारी AI कैपिटल स्पेंडिंग की सस्टेनेबिलिटी पर सवाल उठा रहे हैं। अगर ये इन्वेस्टमेंट जल्द ही मुनाफे में तब्दील नहीं हुए, तो टेक-हैवी मार्केट्स में और अधिक सावधानी देखने को मिल सकती है।
निवेशकों के लिए सलाह
हालिया वोलैटिलिटी निवेशकों के लिए एक रिमाइंडर है कि सिर्फ पास्ट परफॉरमेंस के आधार पर स्टॉक्स के पीछे भागने से बचें। मार्केट लीडरशिप अक्सर रोटेट होती है, और ऐतिहासिक डेटा बताता है कि शॉर्ट-टर्म मोमेंटम पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। सबसे प्रभावी तरीका बिजनेस फंडामेंटल्स पर ध्यान केंद्रित करना, सेक्टर्स और जियोग्राफीज में डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो बनाए रखना और यह मॉनिटर करना है कि कंपनियां हाई-इंटरेस्ट-रेट वाले माहौल में कॉस्ट और अर्निंग्स को कैसे मैनेज कर रही हैं।
