Apple Pay को भारत में लॉन्च करने की कंपनी की योजना फिलहाल टल गई है। वजह है ट्रांजैक्शन फीस को लेकर बैंकों के साथ चल रहा विवाद। जहाँ Apple 15-20 बेसिस पॉइंट की फीस चाहता है, वहीं भारतीय बैंक इसे ज़्यादा बता रहे हैं।
Apple Pay भारत में क्यों अटक रहा है?
Apple अपने डिजिटल पेमेंट सर्विस Apple Pay को भारतीय बाज़ार में उतारने की तैयारी कर रहा था, लेकिन यह लॉन्चिंग फिलहाल टल गई है। इसकी वजह है स्थानीय बैंकों के साथ चल रहा कमर्शियल विवाद, खासकर ट्रांजैक्शन फीस को लेकर।
फीस पर क्यों है इतना बड़ा पेंच?
खबरों के मुताबिक, Apple हर क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन पर 15-20 बेसिस पॉइंट (bps) की फीस मांग रहा है। यह फीस ग्लोबल मार्केट में Apple की पेमेंट सर्विस के लिए आम है।
लेकिन, भारतीय बैंक इस मांग के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि भारत के पेमेंट इकोसिस्टम में यह दर बहुत ज़्यादा है। भारत में क्रेडिट कार्ड प्रोसेसिंग फीस आमतौर पर 5 बेसिस पॉइंट के आसपास होती है।
इसके अलावा, भारत में पेमेंट के लिए UPI (Unified Payments Interface) का दबदबा है, जो कि एक ज़ीरो-कॉस्ट मॉडल पर काम करता है। Apple Pay का रेवेन्यू मॉडल, जो कि फीस पर आधारित है, भारतीय बाज़ार की असलियत से मेल नहीं खाता।
UPI से कैसे अलग है Apple Pay?
UPI के विपरीत, जो मोबाइल नंबर और QR कोड पर चलता है, Apple Pay शुरुआत में NFC (Near Field Communication) तकनीक पर काम करेगा और क्रेडिट-डेबिट कार्ड को सपोर्ट करेगा। इसका मतलब है कि Apple Pay सीधे Google Pay, PhonePe और Paytm जैसे प्लेटफॉर्म्स से मुकाबला करेगा, लेकिन एक अलग कॉस्ट स्ट्रक्चर के साथ। बैंकों के लिए, Apple जैसी थर्ड-पार्टी कंपनी को ज़्यादा फीस देना उनके पहले से ही कम मार्जिन को और घटा सकता है।
क्या हैं बाकी चुनौतियां?
तकनीकी और रेगुलेटरी ज़रूरतें, जैसे डेटा लोकलाइजेशन और बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन, Apple ने पूरी कर ली हैं। लेकिन, फीस को लेकर चल रहा गतिरोध एक बड़ी बाधा बना हुआ है। इस वजह से, लॉन्च की उम्मीदें 2026 के अंत या उसके बाद तक खिसक गई हैं।
Apple Pay की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह भारतीय बैंकों के साथ किसी समझौते पर पहुँच पाता है या नहीं। अगर फीस का मुद्दा हल नहीं हुआ, तो कंपनी को पार्टनर्स ढूंढने में मुश्किल हो सकती है।
