दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियां Apple और Google चीन से हटकर भारत में अपना मैन्युफैक्चरिंग बेस बढ़ा रही हैं। केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि Apple अपने प्रोडक्शन को और बढ़ाने पर विचार कर रही है, जबकि Google अपने एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड डिवाइस प्रोडक्शन को भारत और वियतनाम शिफ्ट करने की योजना बना रही है। निवेशक इस सप्लाई चेन शिफ्ट पर नजर रख रहे हैं, हालांकि, डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन का कम होना एक बड़ा रिस्क बना हुआ है।
भारत बनेगा ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स हब?
भारत दुनिया भर में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक अहम केंद्र बनता जा रहा है। बड़ी टेक कंपनियां Apple और Google भी देश में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का विस्तार करने की तैयारी में हैं। 21 अगस्त 2026 को केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पुष्टि की है कि सरकार Apple के साथ मिलकर आईफोन असेंबली के अलावा अन्य प्रोडक्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने पर चर्चा कर रही है। यह कदम Apple की इंडिया स्ट्रैटेजी में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।
Google की भी भारत में एंट्री?
इसी के साथ, Google भी अपने Pixel स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच और वायरलेस ईयरबड्स जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड प्रोडक्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग चीन से भारत और वियतनाम शिफ्ट करने की योजना बना रही है। उम्मीद है कि यह बदलाव 2027 तक पूरा हो जाएगा। Google ने भारत में Dixon Technologies जैसी लोकल कंपनियों के साथ मिलकर पहले ही Pixel की शुरुआती प्रोडक्शन शुरू कर दी है। यह कदम 'चाइना प्लस वन' स्ट्रेटेजी का हिस्सा है, जहाँ कंपनियां चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाई कर रही हैं।
सरकारी नीतियों का सपोर्ट
सरकार इस विस्तार को बड़े पैमाने पर सपोर्ट कर रही है। 'मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS)' के तहत FY27–FY31 के लिए ₹62,500 करोड़ का फंड आवंटित किया गया है। इसका मकसद ग्लोबल कंपनियों को भारत में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना और डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स को बढ़ावा देना है। इसके अलावा, सरकार अगले 10 से 14 महीनों में तीन नई भारतीय स्मार्टफोन कंपनियां बनाने पर भी फोकस कर रही है, ताकि वे हाई-वॉल्यूम मार्केट में बड़े ब्रांड्स को टक्कर दे सकें। फिलहाल, भारत में इस्तेमाल होने वाले 99.2% मोबाइल फोन यहीं मैन्युफैक्चर होते हैं। वित्तीय वर्ष 2026 में, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट ने $48 बिलियन का रिकॉर्ड तोड़ा है।
बड़े ऑपरेशनल रिस्क
हालांकि, असेंबली कैपेसिटी बढ़ने के बावजूद, इस सेक्टर में कुछ बड़ी चुनौतियाँ भी हैं। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन का है, जो फिलहाल सिर्फ 20% से 22% के बीच है। इसका मतलब है कि भारत में ज्यादातर काम सिर्फ असेंबली का हो रहा है और मेमोरी चिप्स जैसे जरूरी कंपोनेंट्स के लिए देश अभी भी इम्पोर्ट पर निर्भर है। चीन के मजबूत सप्लाई चेन इकोसिस्टम से मुकाबला करने के लिए भारत को अपनी इन्फ्रास्ट्रक्चर और कंपोनेंट सोर्सिंग कैपेसिटी में काफी सुधार करना होगा। इसके अलावा, ट्रेड पॉलिसी, टैरिफ और PLI स्कीम में बदलाव का भी इस इंडस्ट्री पर असर पड़ सकता है। निवेशकों की नजरें इस बात पर रहेंगी कि कंपनियां लोकल कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को कितना बढ़ा पाती हैं और नई मैन्युफैक्चरिंग हब स्थापित करने में आने वाली लॉजिस्टिक्स और बढ़ती लागत के बीच प्रॉफिट मार्जिन कैसे बनाए रखती हैं।
