Anupam Mittal की AI कंपनियों को चेतावनी: भारत में सफल होना है तो कीमत नहीं, 'वैल्यू' पर ध्यान दें

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AuthorAditya Rao|Published at:
Anupam Mittal की AI कंपनियों को चेतावनी: भारत में सफल होना है तो कीमत नहीं, 'वैल्यू' पर ध्यान दें

Shaadi.com के फाउंडर Anupam Mittal ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल AI कंपनियां सिर्फ दाम घटाकर भारत में सफल नहीं हो सकतीं। उनका तर्क है कि भारतीय ग्राहक हर प्रोडक्ट के लिए तुरंत और ठोस उपयोगिता चाहते हैं। टेक निवेशकों के लिए, यह ज़रूरी है कि कंपनियां पश्चिमी बाज़ारों से मॉडल इम्पोर्ट करने के बजाय भारत-विशिष्ट प्रोडक्ट स्ट्रेटेजी बनाएं।

भारत में AI का फ्यूचर: कीमत से ज़्यादा 'वैल्यू' ज़रूरी

Shaadi.com के फाउंडर और 'शार्क टैंक इंडिया' के जज Anupam Mittal ने भारतीय बाज़ार में कदम रखने वाली ग्लोबल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती पर प्रकाश डाला है। उनका मानना है कि ये कंपनियां फिलहाल सिर्फ कीमत के बजाय प्रोडक्ट की 'वैल्यू' का सख़्त इम्तिहान दे रही हैं। Mittal के अनुसार, भारत कोई ऐसा दूसरा बाज़ार नहीं है जहाँ पश्चिमी बिजनेस मॉडल को कम कीमत पर कॉपी किया जा सके। बल्कि, भारतीय ग्राहक किसी भी प्रीमियम सर्विस के लिए पैसे खर्च करने से पहले उसकी तुरंत और व्यावहारिक उपयोगिता पर बहुत ध्यान देते हैं।

'इससे मेरा क्या होगा?' - भारतीय ग्राहक का मिजाज

Mittal ने जिस उपभोक्ता सोच को उजागर किया है, उसे आम बोलचाल के वाक्य 'भाई, इससे मेरा क्या होगा?' से समझा जा सकता है। इसका मतलब है कि किसी अंतरराष्ट्रीय प्रोडक्ट का 'सस्ता वर्ज़न' लॉन्च करना अक्सर काफ़ी नहीं होता। भारत के ग्राहक, अगर उन्हें किसी प्रीमियम सर्विस से सीधा और तत्काल फायदा नज़र नहीं आता, तो वे सब्सक्रिप्शन शेयर करने, फ्री ट्रायल का इस्तेमाल करने या मुफ्त विकल्प खोजने में माहिर हैं।

निवेशकों के लिए क्या है खास?

AI-केंद्रित टेक्नोलॉजी कंपनियों के ग्रोथ पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए यह एक अहम सीख है। Mittal ने बताया कि टेलीकॉम और डिजिटल पेमेंट जैसे सेक्टर पहले भी ऐसे दौर से गुज़र चुके हैं। जो कंपनियां भारत में सफल हुईं, उन्होंने अक्सर अपनी सेवाओं को स्थानीय खपत के पैटर्न के हिसाब से ढाला। उदाहरण के लिए, सस्ते डेटा प्लान्स की भारी सफलता और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) की अनूठी संरचना। जो AI फर्में बिना बड़े लोकलाइजेशन के ग्लोबल सब्सक्रिप्शन मॉडल को थोपने की कोशिश करेंगी, उन्हें कस्टमर रिटेंशन (ग्राहक बनाए रखना) और कन्वर्ज़न रेट (ग्राहक में बदलना) में बड़ी मुश्किल आ सकती है।

शेयरहोल्डर्स के लिए रिस्क

शेयरहोल्डर्स के लिए यह जोखिम है कि अगर प्रोडक्ट रोज़मर्रा की ज़रूरत के हिसाब से स्पष्ट वैल्यू नहीं दे पाता, तो कस्टमर एक्विजिशन (ग्राहक जुटाना) की लागत बहुत ज़्यादा हो सकती है। जो कंपनियां यूज़र्स और बिजनेसेज़ के लिए भारत-विशिष्ट प्लान और रियल-टाइम एफिशिएंसी टूल्स बनाने को प्राथमिकता देती हैं, उनके सस्टेनेबल ग्रोथ करने की ज़्यादा संभावना है। इसके विपरीत, जो फर्में एक स्टैण्डर्ड इंटरनेशनल स्ट्रेटेजी पर निर्भर रहेंगी, उनकी ग्रोथ भारतीय बाज़ार की 'उपयोगिता' पर ज़्यादा ध्यान देने की प्रवृत्ति के कारण सीमित हो सकती है।

आगे क्या?

निवेशकों के लिए आगे की सबसे अहम बात यह होगी कि टेक्नोलॉजी कंपनियां अपने प्रोडक्ट रोडमैप को कैसे अपनाती हैं। यह सिर्फ़ AI मॉडल के बारे में नहीं है, बल्कि यह इस बारे में है कि वह मॉडल भारतीय यूज़र्स की रोज़मर्रा की समस्याओं को हल करने वाले स्थानीय समाधानों में कैसे बदलता है। सफल इंटीग्रेशन इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या कंपनियां ग्लोबल प्राइसिंग स्ट्रेटेजी से हटकर लोकल वैल्यू क्रिएशन पर ध्यान केंद्रित कर पाती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.