आंध्र प्रदेश के सीएम एन. चंद्रबाबू नायडू सिंगापुर में ग्लोबल सेमीकंडक्टर कंपनियों को राज्य में नया मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए पिच कर रहे हैं। हालांकि राज्य 'बिजनेस करने की रफ्तार' पर जोर दे रहा है, पर निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि चिप मैन्युफैक्चरिंग में भारी निवेश और बिजली-पानी जैसी बड़ी ज़रूरतों का सामना करना पड़ता है।
क्या हुआ?
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू हाल ही में सिंगापुर गए थे, जहां उन्होंने GlobalFoundries, NXP, ASMPT जैसी कई ग्लोबल सेमीकंडक्टर कंपनियों से मुलाकात की। इस दौरे का मकसद राज्य के रायलासीमा रीजन को सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी के लिए एक आकर्षक डेस्टिनेशन के तौर पर पेश करना था। एक राउंडटेबल डिस्कशन के दौरान, मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार की 'स्पीड ऑफ डूइंग बिजनेस' पहल पर ज़ोर दिया, जिसका लक्ष्य आसान अप्रूवल प्रोसेस और सपोर्टिव इंडस्ट्रियल पॉलिसीज़ के ज़रिए इंटरनेशनल फर्मों को आकर्षित करना है। उन्होंने इंडस्ट्री लीडर्स को सेमीकंडक्टर, डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन यूनिट्स के लिए राज्य की क्षमता का मूल्यांकन करने आंध्र प्रदेश आने का न्योता दिया।
सेमीकंडक्टर हब क्यों हैं हाई-स्टेक्स?
निवेशकों के लिए, सेमीकंडक्टर सेक्टर एक बड़ा लॉन्ग-टर्म प्ले है। एक 'फैब' (फैब्रिकेशन प्लांट) स्थापित करना दुनिया की सबसे महंगी और जटिल इंडस्ट्रियल परियोजनाओं में से एक है। इसमें अरबों डॉलर का शुरुआती निवेश (कैपिटल एक्सपेंडिचर) लगता है और फैसिलिटी के मुनाफे में आना शुरू होने तक लंबा समय लगता है। यह सेक्टर ऑटोमोबाइल, स्मार्टफोन, एयरोस्पेस और डिफेंस इंडस्ट्रीज़ के भविष्य के लिए क्रिटिकल है, जो इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स पर तेज़ी से निर्भर हो रहे हैं। जब कोई राज्य सरकार इस सेक्टर को टारगेट करती है, तो अक्सर उसका लक्ष्य एक ऐसी सेल्फ-सस्टेनिंग इकोसिस्टम बनाना होता है जो सहायक व्यवसायों को आकर्षित करे और हाई-स्किल्ड जॉब्स पैदा करे, लेकिन ऐसी किसी भी कोशिश की सफलता लगातार पॉलिसी सपोर्ट और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसोर्स का टेस्ट
जहां निवेश आकर्षित करने का इरादा स्पष्ट है, वहीं सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को भारत में खास तौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में अनूठी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। एक चिप फैब्रिकेशन यूनिट को बिना रुकावट, हाई-क्वालिटी पावर और भारी मात्रा में अल्ट्रा-प्योर पानी की ज़रूरत होती है। निवेशकों को यह देखना चाहिए कि राज्य इन ज़रूरी यूटिलिटीज़ को कैसे प्रदान करने की योजना बना रहा है, खासकर रायलासीमा क्षेत्र में, जहां ऐतिहासिक रूप से पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री को एक हाईली स्पेशलाइज्ड वर्कफोर्स और रिलायबल सप्लाई चेन की ज़रूरत होती है। भले ही कोई कंपनी प्लांट लगाने का फैसला करे, प्रोजेक्ट की सफलता राज्य की इस क्षमता पर निर्भर करेगी कि वह लगातार रिसोर्स उपलब्ध करा सके, बिना किसी बड़े कॉस्ट ओवररन या देरी के।
कॉम्पिटिटिव लैंडस्केप
आंध्र प्रदेश अकेला ऐसा राज्य नहीं है जो सेमीकंडक्टर फर्मों को लुभाने की कोशिश कर रहा है। गुजरात, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना जैसे अन्य भारतीय राज्य भी नेशनल प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के तहत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को आक्रामक रूप से आगे बढ़ा रहे हैं। इन राज्यों ने पहले ही इंडस्ट्रियल क्लस्टर बनाने और ग्लोबल प्लेयर्स को इंसेंटिव देने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। निवेशकों के लिए, यह प्रतिस्पर्धा एक दोधारी तलवार है। जहां यह राज्यों को अपने बिजनेस एनवायरनमेंट को बेहतर बनाने के लिए मजबूर करती है, वहीं इसका मतलब यह भी है कि कंपनियों के पास कई विकल्प हैं, जो राज्य सब्सिडी और कंसेशन के मामले में 'रेस टू द बॉटम' का कारण बन सकता है। अगर इसे सावधानी से मैनेज न किया जाए तो यह राज्य के फिस्कल हेल्थ पर असर डाल सकता है।
आगे क्या देखें?
निवेशकों को शुरुआती घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस प्रगति पर ध्यान देना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या ये चर्चाएं साइंड मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoUs) और एक्चुअल लैंड अलॉटमेंट में बदलती हैं। प्रस्तावित प्रोजेक्ट एरिया में ज़रूरी पावर और वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को ट्रैक करना भी ज़रूरी होगा। अंत में, निवेशकों को उन विशिष्ट स्टेट-लेवल पॉलिसीज़ या सब्सिडीज़ पर नज़र रखनी चाहिए जो इन बड़े प्रोजेक्ट्स के राज्य के बजट पर फिस्कल इम्पैक्ट को स्पष्ट कर सकें। यह देखना भी ज़रूरी है कि ये संभावित मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स नेशनल सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में कैसे इंटीग्रेट होते हैं और क्या वे प्रमुख ग्लोबल टेक्नोलॉजी प्लेयर्स के साथ पार्टनरशिप सफलतापूर्वक हासिल करते हैं।
