Amazon में काम करने वाली एक मशीन लर्निंग इंजीनियर, हरिका सत्ती, ने भारत में ₹40 लाख प्रति वर्ष के ऑफर को ठुकराकर अमेरिका में $200,000 (लगभग ₹1.66 करोड़) के सालाना पैकेज वाली नौकरी चुनी है। यह फैसला कई भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए सोचने पर मजबूर करता है कि विदेश में ऊंची कमाई और बेहतर करियर ग्रोथ की तलाश कितनी फायदेमंद है।
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करियर ग्रोथ और रिसोर्स एक्सेस का खेल
टेक्नोलॉजी सेक्टर में प्रोफेशनल्स के लिए यह एक बड़ा सवाल होता है कि तुरंत मिलने वाली सहूलियतों को चुनें या स्किल डेवलपमेंट के बड़े मौके को। हरिका सत्ती का कहना है कि जहाँ भारत में ₹40 लाख का पैकेज एक आरामदायक जिंदगी दे सकता है, वहीं उनकी प्राथमिकता खास इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच बनाना था। उन्होंने बताया कि अमेरिका की नौकरियों में अक्सर कंप्यूटिंग पावर और डेटा हैंडलिंग के लिए बड़े बजट मिलते हैं, जो जटिल मशीन लर्निंग मॉडल पर काम करने वालों के लिए बेहद जरूरी हैं। इस माहौल में ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम करने का मौका मिलता है जो शायद हर रीजनल ऑफिस में उपलब्ध या पूरी तरह से स्केल न किए गए हों।
पैसों का गणित और रहने का खर्च
दोनों देशों के बाजार में परचेजिंग पावर पैरिटी (purchasing power parity) पर अक्सर चर्चा होती है। अमेरिका का पैकेज भारतीय मुद्रा में लगभग ₹1.66 करोड़ बनता है, लेकिन इसमें टैक्स और रहने का काफी ज़्यादा खर्च शामिल है। सत्ती ने बताया कि सिएटल में उनके मंथली बजट का लगभग 15% घर के किराए पर और 10% खाने-पीने व ट्रांसपोर्ट पर खर्च होता है। इन खर्चों के बावजूद, वे अपने टेक-होम इनकम का करीब 60-65% बचा लेती हैं।
टेक टैलेंट मार्केट का बड़ा ट्रेंड
यह ट्रेंड स्पेशलाइज्ड टेक टैलेंट के लिए लगातार बढ़ रही प्रतिस्पर्धा को दिखाता है। Amazon जैसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां अक्सर ग्लोबल टैलेंट को उन सेंटर्स में ले जाती हैं जहाँ रिसर्च और डेवलपमेंट सबसे ज्यादा होता है। भारतीय इंजीनियरों के लिए, यह माइग्रेशन ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिसेज को जल्दी सीखने का एक तरीका है। हालांकि, यह फैसला सिर्फ नौकरी की सुरक्षा से आगे बढ़कर प्रोफेशनल एडवांसमेंट को प्राथमिकता देने का भी संकेत देता है। जैसे-जैसे भारतीय टेक सेक्टर बड़ा हो रहा है और कंपनियां लोकल R&D पर खर्च बढ़ा रही हैं, डोमेस्टिक और इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स के बीच जटिलता का अंतर टॉप टैलेंट और रिक्रूटर्स के लिए एक अहम मुद्दा बना रहेगा।
