Accenture ने अपने कर्मचारियों के लिए सैलरी बढ़ाने का एक नया तरीका अपनाया है। अब से, जून साइकिल में मिलने वाली सैलरी हाइक दो हिस्सों में बांटी जाएगी: आधा बेस पे (Base Pay) बढ़ेगा और आधा एकमुश्त लंप-सम (Lump-sum) पेमेंट के तौर पर मिलेगा। इसका मकसद ज्यादा से ज्यादा कर्मचारियों को फायदा पहुंचाना और कंपनी के पेरोल खर्चों को कंट्रोल करना है। हालांकि, प्रमोशन पाने वाले कर्मचारियों के लिए यह नियम लागू नहीं होगा, उन्हें पूरी हाइक सीधे बेस पे में ही मिलेगी।
सैलरी हाइक का नया मॉडल: बेस पे और लंप-सम का खेल
Accenture ने जून के लिए अपनी नई कंपनसेशन स्ट्रैटिजी (Compensation Strategy) का ऐलान किया है। इसके तहत, कर्मचारियों को मिलने वाली सालाना सैलरी हाइक को दो बराबर हिस्सों में बांटा जाएगा। पहला हिस्सा उनके रेगुलर बेस पे (Base Pay) में जोड़ा जाएगा, और दूसरा हिस्सा एक वन-टाइम लंप-सम (One-time Lump-sum) पेमेंट के रूप में दिया जाएगा। पिछले सालों के मुकाबले यह एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि पहले सैलरी हाइक का पूरा हिस्सा सिर्फ बेस पे में ही बढ़ता था।
कर्मचारियों पर क्या होगा असर?
मान लीजिए, किसी कर्मचारी को कुल 3% की सैलरी हाइक मिलनी है। तो इस नए नियम के मुताबिक, उसके बेस पे में 1.5% की बढ़ोतरी होगी और बाकी 1.5% उसे एक सिंगल लंप-सम पेमेंट के तौर पर मिल जाएगा। कंपनी का कहना है कि इस तरीके से ज्यादा से ज्यादा स्टाफ को तुरंत कैश का फायदा मिलेगा।
सबसे अहम बात यह है कि यह 50:50 का बंटवारा उन कर्मचारियों पर लागू नहीं होगा जिनका प्रमोशन हुआ है। प्रमोशन पाने वाले कर्मचारियों को उनकी पूरी सैलरी हाइक सीधे उनके बेस पे में ही मिलेगी।
यह लंप-सम पेमेंट दिसंबर में मिलने वाले परफॉर्मेंस बोनस (Performance Bonus) से बिल्कुल अलग है। हालांकि, बेस पे में हुई बढ़ोतरी और लंप-सम पेमेंट, दोनों को ही फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में कर्मचारी की कुल कमाई का हिस्सा माना जाएगा। यह इसलिए भी खास है, क्योंकि यही कुल कमाई FY26 के बोनस की कैलकुलेशन का आधार बनेगी। जो कर्मचारी कंपनी के शेयर प्लान, जैसे वॉलंटरी इक्विटी इन्वेस्टमेंट प्रोग्राम (Voluntary Equity Investment Program) या एम्प्लॉई शेयर परचेज प्लान (Employee Share Purchase Plan) का हिस्सा हैं, उनके लिए भी इस लंप-सम पेमेंट पर स्टैंडर्ड परसेंटेज डिडक्शन लागू होंगे।
मुश्किल दौर में पेरोल मैनेजमेंट
यह नया कंपनसेशन स्ट्रैटिजी ऐसे समय में आई है, जब कई ग्लोबल आईटी सर्विस कंपनियां अनिश्चित आर्थिक माहौल में अपने पेरोल खर्चों को ऑप्टिमाइज़ (Optimize) करने की कोशिश कर रही हैं। फिक्स्ड बेस सैलरी की ग्रोथ को कंट्रोल करके, जो समय के साथ बढ़ती जाती है और रिटायरमेंट या बेनिफिट कैलकुलेशन को प्रभावित करती है, कंपनी ज्यादा कर्मचारियों को पे-इंक्रीमेंट दे सकती है। इससे कंपनी के कुल पेरोल एक्सपेंडिचर पर उतना ज्यादा बोझ नहीं पड़ेगा, जितना सिर्फ बेस-पे बढ़ाने से पड़ता।
इन्वेस्टर्स (Investors) के लिए, यह देखना अहम होगा कि इस बदलाव का कर्मचारी रिटेंशन (Employee Retention) और ऑपरेशनल मार्जिन्स (Operational Margins) पर क्या असर पड़ता है। हालांकि इससे थोड़े समय के लिए पेरोल खर्चों में राहत मिल सकती है, लेकिन टैलेंट को बनाए रखने की लड़ाई में, खासकर आईटी सेक्टर में, इसका लॉन्ग-टर्म असर देखना होगा। इन्वेस्टर्स आने वाली तिमाहियों में मैनेजमेंट से यूटिलाइजेशन रेट्स (Utilization Rates) और वेज ग्रोथ ट्रेंड्स (Wage Growth Trends) पर कमेंट्री पर नजर रख सकते हैं, ताकि यह समझा जा सके कि यह स्ट्रैटिजी कॉस्ट कंट्रोल और स्किल्ड टैलेंट को बनाए रखने की जरूरत के बीच सही संतुलन बना पा रही है या नहीं।
