स्मार्टफोन के अगले बड़े विकल्प के तौर पर देखे जा रहे AI वियरेबल्स अब प्राइवेसी और डेटा सिक्योरिटी को लेकर बड़ी मुश्किलों में घिरे हैं। अब टेक कंपनियां इस चुनौती से निपटने के लिए ऑन-डिवाइस प्रोसेसिंग और कैमरा-फ्री हार्डवेयर पर दांव लगा रही हैं।
डेटा प्राइवेसी बनी बड़ी बाधा
जो तकनीक कल तक कंज्यूमर टेक का भविष्य मानी जा रही थी, उसे अब रेगुलेटरी और आम जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ा विवाद डेटा कलेक्शन को लेकर है। कैमरे और माइक्रोफोन का उपयोग करने वाले वियरेबल्स को सार्वजनिक जगहों पर लोग अपनी प्राइवेसी में दखल के तौर पर देख रहे हैं। Meta Platforms के स्मार्ट ग्लासेस पहले ही कानूनी जांच के दायरे में हैं, क्योंकि उन पर बिना यूजर की सहमति के AI ट्रेनिंग के लिए डेटा इस्तेमाल करने के आरोप लगे हैं।
नई रणनीति: ऑन-डिवाइस प्रोसेसिंग
इस 'ट्रस्ट डेफिसिट' (Trust Deficit) को मिटाने के लिए कंपनियां अब क्लाउड-आधारित AI से हटकर 'ऑन-डिवाइस प्रोसेसिंग' की ओर बढ़ रही हैं। इसका मतलब है कि यूजर का डेटा बाहर के सर्वर्स पर जाने के बजाय डिवाइस के अंदर ही प्रोसेस होगा। हालांकि, यह बदलाव इतना आसान नहीं है। इसके लिए बेहतर प्रोसेसिंग पावर और बैटरी लाइफ की जरूरत है, जिसके चलते हार्डवेयर के प्रोडक्शन कॉस्ट में इजाफा हो सकता है और नए डिवाइसेज के लॉन्च में कई साल की देरी भी हो सकती है।
कैमरा-फ्री डिवाइसेज का उदय
बाजार में अब एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है—कैमरा-फ्री हार्डवेयर। Even Realities, Plaud और Pocket जैसे स्टार्टअप्स ऑडियो-केंद्रित डिवाइसेज पर ध्यान दे रहे हैं। ये कंपनियां मानकर चल रही हैं कि प्राइवेसी सिर्फ एक नियम नहीं, बल्कि मास मार्केट के लिए सबसे जरूरी शर्त है।
निवेशकों के लिए सबक
निवेशकों को यह समझना होगा कि AI वियरेबल्स का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां कैसे इनोवेशन और प्राइवेसी के बीच तालमेल बिठाती हैं। भविष्य में वही कंपनियां लीड करेंगी जो रेगुलेटरी सख्ती और कंज्यूमर बैकलेश से बचते हुए AI फीचर्स दे पाएंगी। अब निवेशकों को कंपनियों की डेटा मैनेजमेंट पॉलिसी और ऑन-डिवाइस प्रोसेसिंग की व्यावसायिक व्यवहार्यता पर पैनी नजर रखनी होगी।
