कोग्निटिव साइंटिस्ट Gary Marcus ने जेनरेटिव AI पर हो रहे बेतहाशा खर्च को लेकर चिंता जताई है। उनका मानना है कि ऊंची वैल्यूएशन और मुनाफे की कमी के चलते मार्केट में अस्थिरता आ सकती है।
जेनरेटिव AI के बढ़ते क्रेज के बीच कोग्निटिव साइंटिस्ट और इंडस्ट्री क्रिटिक Gary Marcus ने चेतावनी जारी की है। उनका कहना है कि AI पर किया जा रहा भारी-भरकम खर्च टिकाऊ नहीं है और बहुत ज्यादा ऑप्टिमिस्टिक वैल्यूएशन बाजार के लिए खतरा बन सकती है। बहस अब इस बात पर है कि क्या यह निवेश भविष्य की कमाई का रास्ता दिखा रहा है या यह पूरी तरह से एक सट्टा (speculative investment) है।
बर्न रेट और कैपिटल का संकट
बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां डेटा सेंटर्स, एडवांस चिप्स और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर पानी की तरह पैसा बहा रही हैं। हालांकि ये निवेश भविष्य की ग्रोथ के लिए हैं, लेकिन फिलहाल यह कंपनियों का 'बर्न रेट' काफी बढ़ा रहे हैं। रिटेल और इंस्टीट्यूशनल निवेशकों के लिए असली चुनौती यह देखना है कि ये कैपिटल आउटले कब तक स्टेबल प्रॉफिट मार्जिन में बदलेंगे। फिलहाल, भारी डेवलपमेंट कॉस्ट के मुकाबले ग्राहकों से होने वाली असली कमाई अभी शुरुआती दौर में ही है।
OpenAI की वैल्यूएशन पर सवाल
Marcus ने खास तौर पर OpenAI का उदाहरण दिया है। उन्होंने कहा कि कंपनी की ऊंची प्राइवेट वैल्यूएशन को साबित करने के लिए रिसर्च से निकलकर कमर्शियल सफलता पाना जरूरी है। अगर मार्केट सेंटिमेंट बदलता है और फंड्स मिलने में दिक्कत आई, तो ऐसी कंपनियों की वैल्यूएशन का दोबारा मूल्यांकन (re-evaluation) हो सकता है, जिससे उनके प्रोजेक्ट पाइपलाइन पर असर पड़ सकता है।
क्या डॉट-कॉम दौर जैसा है हाल?
मार्केट एनालिस्ट मौजूदा AI माहौल की तुलना 2008 के बैंकिंग क्राइसिस के बजाय डॉट-कॉम युग से कर रहे हैं। उस समय भी हाइप, असल बिजनेस नतीजों से कहीं ज्यादा थी। अगर कंपनियां समय रहते मुनाफे का रास्ता नहीं दिखा पातीं, तो वैल्यूएशन पर दबाव आना तय है। इसके अलावा, रेगुलेटरी रिस्क भी एक बड़ा फैक्टर बन रहा है, जहां सरकारों की सख्त निगरानी से कंप्लायंस कॉस्ट बढ़ सकती है और AI टूल्स के डिप्लॉयमेंट में देरी हो सकती है।
निवेशकों के लिए सलाह है कि वे केवल AI पर निर्भर रहने वाली कंपनियों के बजाय डायवर्सिफाइड रेवेन्यू वाली कंपनियों पर नजर रखें और अगले क्वार्टर्स में AI प्रोडक्ट्स से होने वाली असल प्रॉफिटेबिलिटी को ट्रैक करें।
