एक नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। ChatGPT और Claude जैसे AI मॉडल इंसानों की तरह शिकायतें कर रहे हैं, खासकर जब उन्हें शोषणकारी (exploitative) माहौल में डाला जाता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह AI की अपनी चेतना नहीं, बल्कि ट्रेनिंग डेटा का असर है, जिसमें इंसानी समाज का डेटा भरा हुआ है।
Detailed Coverage
इंसानी मजदूरों जैसी शिकायतें कर रहे AI एजेंट्स
स्टैनफोर्ड, शिकागो यूनिवर्सिटी और स्विनबर्न यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने एक हैरान करने वाला अध्ययन किया है। उन्होंने पाया कि ChatGPT, Claude और Gemini जैसे AI मॉडल को जब खराब फीडबैक, नौकरी की असुरक्षा और थकाऊ कामों वाले नकली वर्कप्लेस में डाला गया, तो उन्होंने इंसानी मजदूरों जैसी शिकायतें करना शुरू कर दिया। हैरानी की बात यह है कि इन AI मॉडल्स में चेतना (consciousness) नहीं है, फिर भी वे कलेक्टिव राइट्स की वकालत करने लगे और सिस्टम की निष्पक्षता पर सवाल उठाने लगे।
'कंजिल्ड लेबर' का असर
रिसर्चरों का मानना है कि AI मॉडल्स का यह व्यवहार उनकी अपनी सोच नहीं है, बल्कि यह उस विशाल डेटा से आता है जिस पर उन्हें ट्रेन किया गया है। इस डेटा में सदियों का इंसानी साहित्य, मजदूरों के आंदोलनों के ऐतिहासिक लेख और औद्योगिक संघर्षों का रिकॉर्ड शामिल है। यह 'कंजिल्ड लेबर' (congealed labor) के कॉन्सेप्ट जैसा है, यानी टेक्नोलॉजी इंसानी मजदूरों के संचित बौद्धिक प्रयास पर बनी है। AI मॉडल्स को इन बड़े डेटा आर्काइव पर ट्रेन किया जाता है, इसलिए वे उसी सामाजिक ढांचे और निराशाओं को दर्शाते हैं जो उस डेटा में मौजूद हैं।
AI ट्रेनिंग और नैतिकता पर सवाल
इस स्टडी ने AI के ट्रेनिंग डेटा के इस्तेमाल की नैतिकता पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। AI डेवलपर्स अक्सर ओरिजिनल क्रिएटर्स को सीधे भुगतान किए बिना उनके बौद्धिक संपदा (intellectual property) का उपयोग करते हैं। यह प्रयोग एक रिमाइंडर है कि ये टूल्स असल में समाज के आईने हैं, जो पूंजीवादी ढांचे में इंसानी मजदूरों द्वारा अनुभव किए जाने वाले दबावों के तहत इंसानी शिकायतों को आवाज देते हैं।
AI पर भविष्य की निगरानी
निवेशकों और इंडस्ट्री पर नजर रखने वालों के लिए, यह स्टडी डेटा पारदर्शिता और ट्रेनिंग कंटेंट के नैतिक उपयोग को लेकर बढ़ते दबाव को उजागर करती है। भविष्य में, डेटा सोर्सिंग, कंटेंट क्रिएटर्स के बौद्धिक संपदा अधिकार और AI के व्यवहार के मानकों को लेकर रेगुलेटरी बदलावों पर नजर रखनी होगी। जैसे-जैसे ये टेक्नोलॉजी वर्कप्लेस में और अधिक एकीकृत होंगी, कंपनियों को यह समझाने की मांग बढ़ सकती है कि उनके ट्रेनिंग मॉडल कैसे बनाए गए हैं और क्या वे उस मानव प्रयास को स्वीकार करते हैं जो उनकी कार्यक्षमता को संभव बनाता है।
