भारत में AI की भारी डिमांड ने मेमोरी चिप्स की सप्लाई टाइट कर दी है, जिससे स्मार्टफोन्स की औसत कीमत रिकॉर्ड ₹315 पहुंच गई है। Q2 2026 में शिपमेंट्स **11.1%** गिरे, और अब कॉम्पोनेन्ट की बढ़ती लागत के साथ प्रोसेसर प्राइस हाइक का भी डर सता रहा है।
AI का असर, चिप्स की किल्लत!
दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती डिमांड का असर अब भारतीय स्मार्टफोन मार्केट पर भी दिखने लगा है। AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए मेमोरी चिप्स की भारी डिमांड के चलते इनकी सप्लाई टाइट हो गई है। इसके चलते मैन्युफैक्चरर्स को कॉम्पोनेन्ट्स के लिए काफी ज्यादा पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। सप्लाई चेन पर इस दबाव ने भारत में स्मार्टफोन्स की कीमतों और बिक्री के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है।
रिकॉर्ड ₹315 पहुंचा औसत दाम!
Q2 2026 में, भारत में स्मार्टफोन्स की एवरेज सेलिंग प्राइस (ASP) रिकॉर्ड $315 पर पहुंच गई। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 14.4% ज्यादा है। डिवाइस बनाने की लागत भले ही बढ़ी है, लेकिन मार्केट में वॉल्यूम में भारी गिरावट देखी गई है। इस तिमाही में टोटल शिपमेंट्स 11.1% घटकर 33.2 मिलियन यूनिट्स रह गए। यह दिखाता है कि बढ़ती लागत की वजह से कई ग्राहक नए फोन खरीदने से कतरा रहे हैं।
सस्ते फोन हुए गायब!
इस प्राइस हाइक का असर सभी सेगमेंट्स पर एक जैसा नहीं है। खासकर $100 से कम कीमत वाले एंट्री-लेवल स्मार्टफोन्स के ऑप्शन्स काफी कम हो गए हैं। इस सेगमेंट में शिपमेंट्स पिछले तिमाही में 74.3% तक गिर गए, जिससे मार्केट में इनकी हिस्सेदारी घटकर सिर्फ 4.5% रह गई है। DRAM और NAND मेमोरी की कीमतें आसमान छू रही हैं, ऐसे में मैन्युफैक्चरर्स के लिए प्रॉफिटेबल बने रहते हुए कीमतें कम रखना मुश्किल हो रहा है।
Samsung और SK Hynix का फोकस AI पर
Samsung Electronics और SK Hynix जैसे बड़े चिप सप्लायर्स ज्यादा प्रॉफिट वाले AI सर्वर्स के लिए प्रोडक्शन को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे मोबाइल-ग्रेड मेमोरी के लिए कैपेसिटी कम बची है। इस वजह से स्मार्टफोन ब्रांड्स को लिमिटेड सप्लाई के लिए कॉम्पिटिशन करना पड़ रहा है, जिससे लागत बढ़ रही है। यह दबाव और बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि Qualcomm ने 1 सितंबर, 2026 से अपने Snapdragon प्रोसेसर की कीमतों में डबल-डिजिट बढ़ोतरी का संकेत दिया है।
प्रीमियम और मास-मार्केट ब्रांड्स के बीच बढ़ी दूरी
स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरर्स के स्ट्रैटेजिक फैसलों ने मार्केट में एक साफ विभाजन पैदा कर दिया है। Apple और Samsung जैसे प्रीमियम ब्रांड्स बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर आसानी से डाल सकते हैं। वहीं, मास-मार्केट ब्रांड्स, जो वॉल्यूम पर निर्भर करते हैं, एक मुश्किल स्थिति में हैं। अगर वे ग्राहकों से ज्यादा कीमत वसूलते हैं, तो वॉल्यूम में और गिरावट का खतरा है। अगर वे लागत खुद उठाते हैं, तो उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ जाएगा।
रिप्लेसमेंट साइकिल में इजाफा
इन बढ़ती लागतों के चलते फोन बदलने का साइकिल लंबा होता जा रहा है। भारतीय ग्राहक अब अपने फोन को 48 से 49 महीने तक इस्तेमाल कर रहे हैं। बार-बार अपग्रेड करने के बजाय, ग्राहक अब रीफर्बिश्ड डिवाइस की ओर रुख कर रहे हैं या बड़ी छूट का इंतजार कर रहे हैं। आने वाली तिमाहियों में ब्रांड्स अपनी इन्वेंट्री और प्राइसिंग स्ट्रेटेजी को कैसे मैनेज करते हैं, यह देखना अहम होगा। फेस्टिव सीजन के दौरान प्रोसेसर प्राइस हाइक और लगातार कॉम्पोनेन्ट इन्फ्लेशन के बीच ब्रांड्स अपनी मार्केट शेयर कैसे बनाए रखती हैं, इस पर सबकी निगाहें रहेंगी।
