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Zoho का बड़ा सरकारी सौदा: **1.67 मिलियन** सरकारी ईमेल अब Zoho के क्लाउड पर, डेटा संप्रभुता को मिला बूस्ट

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AuthorMehul Desai|Published at:
Zoho का बड़ा सरकारी सौदा: **1.67 मिलियन** सरकारी ईमेल अब Zoho के क्लाउड पर, डेटा संप्रभुता को मिला बूस्ट
Overview

Zoho ने भारतीय सरकार के साथ एक बड़ा करार किया है, जिसके तहत कंपनी **1.67 मिलियन** से ज़्यादा सरकारी ईमेल खातों को अपने क्लाउड प्लेटफ़ॉर्म पर माइग्रेट करेगी। **₹180 करोड़** से ज़्यादा की यह डील भारत के 'मेक इन इंडिया' (Make in India) और डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty) के लक्ष्यों को मज़बूत करती है।

Zoho बनी सरकारी क्लाउड डील की विजेता!

Zoho Corporation ने भारतीय सरकार के साथ एक महत्वपूर्ण डील फाइनल की है। इसके तहत, नेशनल इनफॉरमेटिक्स सेंटर (NIC) जो कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तहत काम करता है, 16.68 लाख (यानी 1.67 मिलियन) से अधिक सरकारी ईमेल खातों को Zoho के सुरक्षित क्लाउड-आधारित प्लेटफ़ॉर्म पर ले जाया जाएगा। यह कदम सरकार के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षित बनाने और डेटा पर पूरा नियंत्रण रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो राष्ट्रीय डिजिटल आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों के अनुरूप है।

रेवेन्यू में बढ़ोतरी और राष्ट्रीय डेटा के लक्ष्य

इस बड़ी माइग्रेशन डील से Zoho को एक बड़ा और लगातार रेवेन्यू (Revenue) मिलने की उम्मीद है। सरकारी नियमों के अनुसार, प्रति ईमेल खाते के लिए मासिक शुल्क ₹170 से ₹300 तक हो सकता है, जो मेलबॉक्स स्टोरेज क्षमता पर निर्भर करता है। कॉन्ट्रैक्ट की कुल लागत ₹180.10 करोड़ बताई गई है। Zoho, जो एक प्राइवेट कंपनी है और जिसका वैल्यूएशन लगभग $12.5 बिलियन है, के लिए यह सिर्फ एक फाइनेंशियल जीत नहीं है, बल्कि यह सरकारी क्षेत्र में Microsoft और Google जैसे ग्लोबल दिग्गजों के मुकाबले एक मज़बूत भारतीय विकल्प के तौर पर उसकी स्थिति को भी पुख़्ता करता है। Zoho अपनी सेल्फ-फंडेड (Self-funded) फाइनेंसियल स्ट्रेटेजी पर काम करती है, जिससे वह लंबी अवधि के वैल्यू और ग्राहक फोकस को प्राथमिकता देती है। कंपनी ने 2025 में 20% का रेवेन्यू ग्रोथ दर्ज किया था और भारत के डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन से और ज़्यादा फायदा उठाने की योजना बना रही है।

ग्लोबल प्रतिद्वंद्वी और भारत की क्लाउड स्ट्रेटेजी

Zoho का चुना जाना इस बात का संकेत है कि सरकारें अब स्थानीय प्रोवाईडर्स को प्राथमिकता दे रही हैं ताकि डेटा देश की सीमाओं के भीतर ही रहे, जो संप्रभु क्लाउड स्ट्रेटेजी (Sovereign Cloud Strategy) का एक अहम हिस्सा है। Microsoft 365 और Google Workspace जैसे समाधान भले ही सरकार के लिए क्लाउड सेवाएं देते हों, लेकिन डेटा लोकेशन और प्रोवाईडर की मूल कंपनी को लेकर वे सरकारी प्रोजेक्ट्स में जांच के दायरे में आ सकते हैं। Google Workspace की भारतीय योजनाओं की शुरुआत लगभग ₹136 प्रति यूजर प्रति माह से होती है। Zoho का समाधान, NIC के इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ जुड़कर और एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन (End-to-end encryption) व मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (Multi-factor authentication) जैसी सख्त सुरक्षा ज़रूरतों को पूरा करके, सरकारी आवश्यकताओं को पूरा करने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन करता है। भारतीय सरकारी क्लाउड मार्केट लगभग $1.6 बिलियन का है और इसमें सर्विसेज और प्राइवेट क्लाउड की मांग तेज़ी से बढ़ रही है।

लागत पर चिंताएं और संभावित जोखिम

हालांकि इस डील के रणनीतिक फायदे हैं, लेकिन इसमें हुए बड़े निवेश को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, केवल 12 लाख ईमेल खातों को माइग्रेट करने में लगभग ₹1,600 करोड़ का खर्च आ सकता है, जो प्रति यूजर मासिक मूल्य ₹170-₹300 की तुलना में लागत-प्रभावशीलता (Cost-effectiveness) और पारदर्शिता (Transparency) पर सवाल खड़े करता है। आलोचक इस खर्च के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं। Zoho के स्थानीय होने का फायदा है, लेकिन सरकारें एक ही वेंडर पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो सकती हैं, जिससे वेंडर लॉक-इन (Vendor lock-in) का जोखिम पैदा हो सकता है। इसके अलावा, Zoho की लंबी अवधि में ग्लोबल लीडर्स के संसाधनों के बराबर स्केल करने और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए व्यापक समर्थन प्रदान करने की क्षमता पर भी विचार किया जा रहा है।

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