अमेरिका का AI दांव, भारत का आत्मनिर्भर प्लान: क्या बदलेगी दुनिया की टेक तस्वीर?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
अमेरिका का AI दांव, भारत का आत्मनिर्भर प्लान: क्या बदलेगी दुनिया की टेक तस्वीर?
Overview

अमेरिका के एक सीनियर एडवाइजर ने भारत जैसे सहयोगियों से कहा है कि वे 'अमेरिकन AI स्टैक' पर अपने AI सॉल्यूशन बनाएं। यह सलाह ऐसे समय आई है जब भारत की तीन स्टार्टअप कंपनियों ने एक साथ अपने स्वदेशी AI मॉडल लॉन्च कर दिए हैं, जो देश की टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनने की जोरदार कोशिश को दर्शाता है।

अमेरिका की AI 'स्टैक' पर निर्भरता की मांग

व्हाइट हाउस के एक टॉप पॉलिसी एडवाइजर, श्रीराम कृष्णन, ने हाल ही में भारत जैसे देशों से कहा है कि वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े अपने सॉल्यूशन बनाने के लिए अमेरिका के 'AI स्टैक' का इस्तेमाल करें। इसका मतलब है कि चिप्स (जैसे Nvidia और AMD के) से लेकर एडवांस AI मॉडल और उन पर आधारित एप्लिकेशन तक, सब कुछ अमेरिका की टेक्नोलॉजी पर आधारित हो। अमेरिका का यह कदम दुनिया भर में अपनी AI टेक्नोलॉजी का दबदबा कायम रखने और उसे ग्लोबल स्टैंडर्ड बनाने की कोशिश का हिस्सा है। आपको बता दें कि AI मार्केट बहुत तेजी से बढ़ रहा है और 2026 तक इसके $2.52 ट्रिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। फिलहाल, AI चिप मार्केट में Nvidia की हिस्सेदारी 80% से ज़्यादा है, और OpenAI के GPT मॉडल भी काफी पॉपुलर हैं।

भारत का 'आत्मनिर्भर AI' मिशन

इसी बीच, भारत की तरफ से एक बड़ा कदम उठाया गया है। तीन भारतीय स्टार्टअप्स – Sarvam, Bharatgen, और Gnani.ai – ने एक साथ मिलकर अपने खुद के स्वदेशी (indigenous) लार्ज लैंग्वेज और वॉयस AI मॉडल लॉन्च किए हैं, जिन्हें पूरी तरह भारत में ही डेवलप किया गया है। Sarvam ने 30 अरब और 105 अरब पैरामीटर वाले मॉडल पेश किए, जबकि Gnani.ai ने टेक्स्ट-टू-स्पीच मॉडल और Bharatgen ने 17 अरब पैरामीटर वाला मल्टीलिंगुअल मॉडल लॉन्च किया। यह भारत की 'स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी' यानी रणनीतिक स्वतंत्रता और टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनने की चाहत को दिखाता है। सरकार भी 'इंडिया.एआई' मिशन जैसे कार्यक्रमों के ज़रिए इस दिशा में मदद कर रही है, जिसके तहत 58,000 GPU की कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने और $217 अरब के निवेश की योजना है। इसका मकसद भारत की भाषाई विविधता और राष्ट्रीय ज़रूरतों के हिसाब से AI डेवलप करना है।

भू-राजनीतिक (Geopolitical) दांव-पेच

अमेरिका का अपनी AI टेक्नोलॉजी का 'स्टैक' दुनिया भर में फैलाना, चीन के साथ उसकी तकनीकी प्रतिद्वंद्विता का भी एक हिस्सा है। अमेरिका चाहता है कि उसके सहयोगी उसकी टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहें, ताकि वो ग्लोबल स्टैंडर्ड तय कर सके और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों को रोकना आसान हो। ऐसे में, भारत का अपना AI इकोसिस्टम डेवलप करना, अमेरिका के इस 'यूनिपोलर' (एकध्रुवीय) AI ऑर्डर को चुनौती दे सकता है और चीन व अमेरिका के बीच एक तीसरे रास्ते का विकल्प पेश कर सकता है।

AI का ग्लोबल मैदान और चुनौतियाँ

AI की दुनिया में ज़बरदस्त कॉम्पिटिशन है। चिप्स में Nvidia और AMD, तो AI मॉडल में OpenAI और Google आगे हैं। भारत के स्टार्टअप छोटे लेकिन ज़्यादा एफिशिएंट मॉडल बनाने पर फोकस कर रहे हैं। हालांकि, भारत के लिए कई चुनौतियाँ भी हैं। अमेरिका के AI स्टैक पर पूरी तरह निर्भर रहने से भविष्य में टेक्नोलॉजी पर निर्भरता का खतरा है। साथ ही, अमेरिकी और चीनी कंपनियों के भारी-भरकम R&D निवेश के मुकाबले भारतीय स्टार्टअप्स के लिए बड़े और एडवांस मॉडल बनाना काफी महंगा है। भू-राजनीतिक तनाव और एक्सपोर्ट कंट्रोल भी सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकते हैं। इन सबके बीच, टॉप AI टैलेंट को भारत में बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है।

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