ऑटोमेशन की कमी (The Automation Deficit)
कई कंपनियां अपने Onboarding प्रोसेस को सिर्फ एक एडमिनिस्ट्रेटिव काम मानकर चलती हैं, लेकिन यह सोच खतरे से खाली नहीं है। असल में, यह प्रोसेस नई पार्टियों या कर्मचारियों को सिस्टम तक पहुँचने का पहला द्वार है। अगर यहाँ से निगरानी ठीक से न हो, तो सुरक्षा में बड़ी सेंध लग सकती है। आजकल ऑटोमेशन (Automation) का दौर है, लेकिन कई कंपनियों के सिस्टम सिर्फ कागजात इधर-उधर भेजने का काम कर रहे हैं, उनमें असली समझदारी और बारीकियों को पहचानने की क्षमता नहीं है। PwC की ग्लोबल रिस्क सर्वे और Deloitte की रिपोर्ट भी इशारा करती हैं कि थर्ड-पार्टी जोखिम (Third-Party Risk) और जटिल नियम कंपनियों के लिए बड़ी चिंता का विषय हैं।
रेगुलेटरी जांच में तेजी (Regulatory Scrutiny Intensifies)
खासकर फाइनेंसियल सेक्टर में, Know Your Customer (KYC) और Anti-Money Laundering (AML) जैसे नियमों का पालन करना बेहद जरूरी है। इसके अलावा, बाहरी वेंडर्स (Vendors) पर कड़ी निगरानी के नियम भी लगातार सख्त हो रहे हैं। बेसल कमेटी (Basel Committee) जैसे ग्लोबल निकाय भी वेंडर रिलेशनशिप पर अपनी पैनी नजर रख रहे हैं। थर्ड-पार्टी जोखिम (Third-Party Risk) अब बोर्ड लेवल की प्राथमिकता बन गया है। लेकिन, कई कंपनियां आज भी पुरानी, एक जैसी Onboarding प्रक्रियाओं पर ही अटकी हुई हैं, जो बदलते नियमों के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही हैं। डिजिटल इकोनॉमी में बढ़ते ट्रांजेक्शन और नए पार्टनरशिप के चलते, पुराने सिस्टम और स्प्रेडशीट पर निर्भर रहना मुश्किल हो गया है। यही वजह है कि RegTech मार्केट में जबरदस्त ग्रोथ देखने को मिल रही है, जिसके 2026 तक 62.15 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। यह 2024 से 2029 के बीच 31.9% की CAGR से बढ़ेगा।
इंटेलिजेंट ऑर्केस्ट्रेशन का उदय (The Rise of Intelligent Orchestration)
जब डेटा की बात आती है, तो केवल नियमों पर आधारित सिस्टम या मैन्युअल समीक्षाएं कम पड़ जाती हैं। कागजात अधूरे हो सकते हैं, नाम डेटाबेस में पूरी तरह मेल नहीं खा सकते, और अलग-अलग देशों के नियम जटिलताएँ पैदा कर सकते हैं। ऐसे में, पुरानी प्रक्रियाएं या तो काम को बहुत धीमा कर देती हैं या फिर अनिश्चितताओं को बिना जांचे आगे बढ़ा देती हैं। दोनों ही सूरतों में जोखिम बढ़ता है। कर्मचारियों को सिस्टम एक्सेस देने में भी यही समस्याएँ आती हैं, जहाँ पूरी जाँच से पहले ही पहुँच मिल जाती है। इन छोटी-छोटी गलतियों का जमावड़ा समय के साथ बड़ी सिस्टमैटिक कमजोरियाँ पैदा कर देता है। Gartner की मानें तो कंपनियों को अब लगातार निगरानी (Continuous Monitoring) वाले फ्रेमवर्क पर जोर देना चाहिए, न कि सिर्फ समय-समय पर समीक्षा पर। इसीलिए, अब AI-आधारित समाधानों की तरफ रुझान बढ़ रहा है जो नीतियों को ऑटोमेट कर सकें।
रेजिलिएंस के लिए रणनीतिक अनिवार्यताएं (Strategic Imperatives for Resilience)
तो बड़ा सवाल यह है कि क्या आपका ऑटोमेशन (Automation) समझदार है? AI-संचालित Agentic Workflow एक नया दृष्टिकोण लाते हैं। ये सिस्टम ऑटोमेटिक रूप से आने वाले कागजातों को पहचान सकते हैं, जानकारी निकाल सकते हैं, अलग-अलग सिस्टम में उसे वेरिफाई (Verify) कर सकते हैं और खामियों को संदर्भ (Context) के साथ बता सकते हैं। कंप्लायंस (Compliance) जाँच में अब सिर्फ पास/फेल नहीं, बल्कि जोखिम का भी आकलन होगा। गैर-अनुपालन (Non-compliance) की औसत लागत 1.48 करोड़ डॉलर तक जा सकती है, जो कंप्लायंस पर होने वाले खर्च से कहीं ज्यादा है। Gartner का अनुमान है कि 2028 तक 65% कंपनियाँ DevOps वर्कफ्लो में कंप्लायंस ऑटोमेशन को इंटीग्रेट (Integrate) कर लेंगी, जिनमें से 75% AI तकनीक का इस्तेमाल करेंगी।
प्रतिस्पर्धी विभाजन (The Competitive Divide)
आज के बाज़ार में, पुरानी और बिखरी हुई Onboarding प्रणालियों पर निर्भर रहने वाली कंपनियों और स्मार्ट Orchestration प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों के बीच एक स्पष्ट अंतर दिख रहा है। जो कंपनियां पुरानी सोच से आगे नहीं बढ़ेंगी, वे अनजाने में ही ऐसी प्रक्रियागत खामियाँ जमा करती जाएंगी जो बाद में महंगी पड़ेंगी। यह सिर्फ एक ऑपरेशनल मामला नहीं, बल्कि एक स्ट्रेटेजिक कंट्रोल पॉइंट है जो कंपनी की इंटीग्रिटी को परिभाषित करता है। भविष्य के नियमों के हिसाब से Onboarding को डिजाइन करना महत्वपूर्ण है। बढ़ती रेगुलेटरी स्क्रूटनी (Regulatory Scrutiny) और डिजिटल पैमाने के इस युग में, कंपनियां केवल ऊपरी तौर पर कंप्लाइंट दिखने वाली प्रक्रियाओं पर निर्भर नहीं रह सकतीं; उन्हें संरचनात्मक रूप से मजबूत होना होगा। RegTech मार्केट के 2035 तक 85.48 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, जिसके लिए 2026 से 2035 के बीच 16.10% की CAGR का अनुमान है, और AI इसमें अहम भूमिका निभाएगा। PwC की ग्लोबल कंप्लायंस सर्वे 2025 के अनुसार, टेक्नोलॉजी, खासकर साइबर सिक्योरिटी (Cybersecurity) और डेटा प्रोटेक्शन (Data Protection), कंपनियों के लिए टॉप कंप्लायंस जोखिमों में से हैं।
