'डिजिटल चोकपॉइंट' से कमाई की कोशिश
ईरान का यह कदम वैश्विक डिजिटल कनेक्टिविटी के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। हॉरमज जलडमरूमध्य, जो दुनिया भर में तेल शिपमेंट के लिए अहम है, साथ ही यह डिजिटल डेटा के लिए भी एक महत्वपूर्ण गलियारा है। लगभग सात प्रमुख सबमरीन केबल सिस्टम इस रणनीतिक समुद्री क्षेत्र से गुजरते हैं। ये केबल महाद्वीपों और अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ते हैं, क्लाउड कंप्यूटिंग, वित्तीय लेनदेन और रक्षा संचार जैसे महत्वपूर्ण डेटा का प्रवाह सुनिश्चित करते हैं।
गूगल, मेटा जैसी कंपनियों पर पड़ेगा बोझ?
ईरान की इस योजना का सीधा असर गूगल (Google), मेटा (Meta), माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) और अमेज़न (Amazon) जैसी बड़ी टेक कंपनियों पर पड़ सकता है। ईरान इन कंपनियों से इन सबसी रूट्स का इस्तेमाल करने के लिए फीस वसूलना चाहता है। इससे ईरान को इन केबलों पर अधिक निगरानी रखने और डेटा प्रवाह को नियंत्रित करने की शक्ति मिल सकती है, जिससे प्राइवेसी (privacy) और सुरक्षा (security) को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
क्या हैं खतरे और चुनौतियां?
ईरान की सेना के पास इन नेटवर्क को बाधित करने की क्षमता है, हालांकि अभी उनका इरादा राजस्व जुटाना बताया जा रहा है। यह स्थिति मिस्र द्वारा स्वेज नहर (Suez Canal) से राजस्व कमाने की तरह है। हाल ही में 2024 में, यमन में हुथी विद्रोहियों (Houthi militants) ने तीन सबसी केबल काटे थे, जिससे उस क्षेत्र में इंटरनेट ट्रैफिक 25% तक कम हो गया था। भले ही इसका वैश्विक प्रभाव सीमित था क्योंकि यह दुनिया की इंटरनेट बैंडविड्थ का केवल 1% था, लेकिन यह घटना महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने की क्षमता को दर्शाती है।
कानूनी अड़चनें और भविष्य?
हालांकि, इस 'डिजिटल टोल' को लागू करने में ईरान को बड़ी अंतरराष्ट्रीय कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ेगा। मौजूदा केबल पुराने अनुबंधों के तहत काम करती हैं, और उन पर नई फीस थोपना मुश्किल होगा। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और संचार की स्वतंत्रता के नियम भी इस योजना को बाधित कर सकते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम राजनयिक दबाव और कानूनी चुनौतियों को जन्म देगा, और टेक कंपनियां इसे रोकने के लिए नई, सुरक्षित और वैकल्पिक रूट पर निवेश बढ़ा सकती हैं।