भारत का स्पेस बजट रिकॉर्ड स्तर पर! अब मिशनों के हार्डवेयर पर होगा बड़ा फोकस

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारत का स्पेस बजट रिकॉर्ड स्तर पर! अब मिशनों के हार्डवेयर पर होगा बड़ा फोकस
Overview

फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस (DoS) का बजट **₹13,705.6 करोड़** तक पहुँच गया है। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) में इजाफे के कारण हुई है, जो स्पेस मिशनों की प्लानिंग से निकलकर हार्डवेयर बनाने के दौर में प्रवेश करने का बड़ा संकेत है।

मिशनों को मिलेगी नई रफ्तार

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए नए वित्तीय खाके से साफ है कि अब असल काम शुरू होने वाला है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस (DoS) को ₹13,705.6 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है। यह पिछले फाइनेंशियल ईयर के ₹12,448.6 करोड़ के रिवाइज्ड अनुमान से काफी ज्यादा है। यह बढ़ोतरी साफ तौर पर बता रही है कि अब रिसर्च और प्लानिंग से आगे बढ़कर बड़े मिशनों के लिए जरूरी हार्डवेयर (Hardware) तैयार करने पर पूरा जोर रहेगा।

कैपिटल एक्सपेंडिचर में भारी उछाल

इस बजट की खास बात यह है कि इसमें कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) पर बड़ा दांव लगाया गया है। कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) लगभग ₹1,066 करोड़ बढ़कर ₹6,375.9 करोड़ हो गई है। यह कुल बजट का करीब 46% हिस्सा है। अधिकारियों का कहना है कि यह पैसा गगनयान (Gaganyaan) मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन, अगली पीढ़ी के लॉन्च व्हीकल (Launch Vehicle) और हाई-थ्रुपुट सैटेलाइट (High-throughput Satellite) जैसे प्रोजेक्ट्स के लिए सीधे तौर पर सपोर्ट करेगा। वहीं, रेगुलर ऑपरेशनल खर्चों के लिए रेवेन्यू एक्सपेंडिचर (Revenue Expenditure) लगभग स्थिर है, जो लॉन्ग-टर्म क्षमताएं बनाने पर फोकस दिखा रहा है।

फंड का रणनीतिक बंटवारा

सबसे बड़ा हिस्सा, ₹10,397.1 करोड़, स्पेस टेक्नोलॉजी (Space Technology) के लिए रखा गया है। इससे VSSC और LPSC जैसे ISRO के अहम सेंटर्स के ऑपरेशन और लॉन्च व्हीकल व सैटेलाइट प्रोजेक्ट्स को सपोर्ट मिलेगा। IN-SPACe के जरिए निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी बढ़ावा दिया जाएगा। स्पेस एप्लीकेशन्स (Space Applications) प्रोग्राम, जो अर्थ ऑब्जर्वेशन (Earth Observation), डिजास्टर मैनेजमेंट (Disaster Management) और रिमोट सेंसिंग (Remote Sensing) के लिए जरूरी हैं, उन्हें ₹1,725.1 करोड़ मिले हैं। खास बात यह है कि स्पेस साइंसेज (Space Sciences) का बजट लगभग तीन गुना होकर ₹569.8 करोड़ तक पहुँच गया है। इससे नए बड़े प्लैनेटरी मिशन (Planetary Mission) और एस्ट्रोनॉमी (Astronomy) प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिलने की उम्मीद है।

वहीं, INSAT सैटेलाइट सिस्टम्स (INSAT Satellite Systems) प्रोग्राम का बजट घटकर ₹130.9 करोड़ कर दिया गया है, जो कम्युनिकेशन सर्विसेज के लिए प्राइवेट लीजिंग मॉडल की तरफ बढ़ने का संकेत है। न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NewSpace India Limited - Nsil), जो ISRO की कमर्शियल विंग है, उसे सिर्फ ₹0.01 करोड़ का बजट सपोर्ट मिला है, लेकिन इसके इंटरनल रिसोर्सेज ₹1,403 करोड़ तक पहुँचने की उम्मीद है, जो कंपनी की कमाई की क्षमता को दर्शाता है।

इंडस्ट्री के साथ जुड़ाव और 'बिल्ड फेज' पर जोर

यह पूरा बजट साफ तौर पर तीन मुख्य बातों पर फोकस कर रहा है: मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए तैयारी, क्लाइमेट और सिक्योरिटी के लिए अर्थ ऑब्जर्वेशन सर्विस को बढ़ाना, और IN-SPACe व Nsil के जरिए इंडस्ट्री के साथ जुड़ाव को मजबूत करना। यह इशारा करता है कि अब रेगुलर ऑपरेशन्स से ज्यादा 'बिल्ड फेज' (Build Phase) पर ध्यान दिया जाएगा। भारत का स्पेस सेक्टर, जिसकी कीमत करीब $8.4 बिलियन है, तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। इसमें निजी क्षेत्र का इनोवेशन और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (Public-Private Partnership) बड़ा रोल निभा रहे हैं। IN-SPACe जैसी पहलों से 658 से ज्यादा एप्लीकेंट्स ने दिलचस्पी दिखाई है। इस बजट से लॉन्च व्हीकल, सैटेलाइट्स और साइंटिफिक मिशनों में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी और मजबूत होगी, जिससे भारत का स्पेस इकोसिस्टम (Space Ecosystem) और भी बेहतर बनेगा। 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksh Station) और 2040 तक चांद पर मानव मिशन जैसे महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अगली पीढ़ी के लॉन्च व्हीकल (NGLV) प्रोजेक्ट को ₹8,240 करोड़ की मंजूरी मिल चुकी है, जिसमें इंडस्ट्री की बड़ी भागीदारी होगी। Nsil से बढ़ती कमर्शियल कमाई और इन प्रोजेक्ट्स का सफल एग्जीक्यूशन, भारत को स्पेस डोमेन में आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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