सरकार का यह फैसला, खासतौर पर चीन से आने वाले निम्न-गुणवत्ता वाले इंपोर्ट को रोकने और देश में 'मेक इन इंडिया' (Make in India) के तहत लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के मकसद से लिया गया है।
ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) अब स्क्रीन प्रोटेक्टर के लिए क्वालिटी स्टैंडर्ड तय करेगा। इन मानकों में इंपैक्ट रेजिस्टेंस (impact resistance), मटेरियल क्वालिटी (material quality), ट्रांसपेरेंसी (transparency) और ड्यूरेबिलिटी (durability) जैसी खूबियों की जांच की जाएगी।
इंडस्ट्री के बड़े प्लेयर्स इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं, क्योंकि इससे प्रोडक्ट की क्वालिटी सुधरेगी और ग्राहकों की सुरक्षा बढ़ेगी। हालांकि, कुछ चुनौतियां भी हैं, जैसे कि इंपोर्टेड रॉ मटेरियल पर निर्भरता और कंज्यूमर प्राइस में संभावित बढ़ोतरी।
भारत में हर साल 550 मिलियन से ज्यादा स्क्रीन प्रोटेक्टर यूनिट्स की खपत होती है, जिनमें इंपोर्टेड प्रोडक्ट्स का बड़ा हिस्सा रहा है। BIS सर्टिफिकेशन की अनिवार्यता के चलते सस्ते और अनब्रांडेड प्रोडक्ट्स के इंपोर्ट पर लगाम लगेगी। Optiemus Infracom जैसी कंपनियां, जो Corning Incorporated की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर लोकल ब्रांड RhinoTech लॉन्च कर चुकी हैं, के लिए यह एक बड़ा अवसर है। लेकिन, यह भी दिखाता है कि अभी भी हाई-टेक इंपोर्टेड ग्लास सब्सट्रेट्स (glass substrates) जैसे कच्चे माल के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बनी हुई है।
यह नया नियम उन कंपनियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है जो सस्ते इंपोर्टेड प्रोडक्ट्स बेच रही हैं। ग्राहकों को शायद थोड़े ज्यादा दाम चुकाने पड़ें। चीन की कंपनियाँ बड़े पैमाने पर रॉ मटेरियल सप्लाई करती हैं, जिससे भारतीय फर्मों के लिए लागत में मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है। BIS नॉर्म्स पर अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक नियम भी लागू हो सकते हैं।
लॉन्ग-टर्म में, इस फैसले से न केवल फाइनल प्रोडक्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग बढ़ेगी, बल्कि ग्लास प्रोसेसिंग और कोटिंग्स जैसे दूसरे संबंधित क्षेत्रों में भी ग्रोथ की उम्मीद है। हालांकि, असली कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय कंपनियां सिर्फ असेंबलिंग और ब्रांडिंग से आगे बढ़कर R&D में निवेश करें और मजबूत लोकल सप्लाई चेन बनाएं। सरकार ने राह दिखा दी है, अब नवाचार (innovation) और तकनीकी आत्मनिर्भरता ही इस सेक्टर को आगे ले जाएगी।
