भारत का PLI स्कीम: मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में '$250 अरब' का रिकॉर्ड, सरकार की एफिशिएंसी का जलवा!

TECH
Whalesbook Logo
AuthorAditya Rao|Published at:
भारत का PLI स्कीम: मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में '$250 अरब' का रिकॉर्ड, सरकार की एफिशिएंसी का जलवा!
Overview

भारत के मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सरकारी प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम का जादू चल गया है! **2020-21** के बाद से, प्रोडक्शन वैल्यू **24 लाख करोड़ रुपये** (लगभग **$250 अरब डॉलर**) के पार पहुंच गई है, जिसने इंडस्ट्री को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है।

PLI स्कीम ने दिलाई मोबाइल प्रोडक्शन में बड़ी जीत

भारत की स्मार्टफोन प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम ने मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। 2020-21 के बाद से, प्रोडक्शन वैल्यू 24 लाख करोड़ रुपये (लगभग $250 अरब डॉलर) से ज्यादा हो चुकी है, जिसने शुरुआती टारगेट को भी पीछे छोड़ दिया है। इस स्कीम ने इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन की पुरानी सोच को बदलकर परफॉरमेंस-बेस्ड इंसेंटिव पर जोर दिया, जो सीधी बिक्री, ग्लोबल स्केल और एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस से जुड़े थे। सरकारी अफसरों का कहना है कि इसने पुरानी एक्सपोर्ट स्कीम की जगह ली और बेहतर पॉलिसी रिटर्न दिया। FY21-26 के लिए कुल सरकारी इंसेंटिव लगभग ₹21,000 करोड़ है, जो कुल प्रोडक्शन वैल्यू का 1% से भी कम है। इस असरदार तरीके ने Apple सप्लायर्स Foxconn, Tata Electronics, Samsung और Dixon Technologies जैसे बड़े प्लेयर्स को फायदा पहुंचाया है।

कम लागत वाली एफिशिएंट खर्चों से इंडस्ट्री ग्रोथ

सरकारी पहलों में PLI स्कीम की एफिशिएंसी खास तौर पर उभरकर आई है। अफसरों और इंडस्ट्री लीडर्स का कहना है कि कम सरकारी लागत में बड़े प्रोडक्शन वॉल्यूम हासिल हुए हैं। FY21-26 में अनुमानित ₹21,000 करोड़ का सरकारी खर्च, कुल प्रोडक्शन वैल्यू का 1% से कम है, जो एक शानदार ROI (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट) दिखाता है। इस टारगेटेड स्ट्रैटेजी ने न सिर्फ सीधे फायदा पाने वाली कंपनियों (जिन्होंने PLI-लिंक्ड आउटपुट में लगभग ₹11 लाख करोड़ का योगदान दिया) बल्कि पूरे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी बढ़ावा दिया है। इंडस्ट्री की ग्रोथ से सरकार को भी भारी रेवेन्यू मिला है, स्कीम शुरू होने के बाद से लगभग ₹1 लाख करोड़ का एडिशनल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) कलेक्ट हुआ है। (ध्यान दें: मोबाइल फोन पर GST रेट अप्रैल 2020 में बढ़कर 18% कर दिया गया था)। इंक्रीमेंटल प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट को रिवॉर्ड देकर, इस स्कीम ने ग्लोबल इंटीग्रेशन को बढ़ावा दिया और मैन्युफैक्चरिंग को डोमेस्टिक जरूरतों से आगे बढ़ाया, जो सरकार के लिए फाइनेंशियली फायदेमंद साबित हुआ।

भारत की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को लागत की चुनौती

इस प्रोग्राम की कामयाबी के बावजूद, एक बड़ी चुनौती बनी हुई है: भारत में मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट दूसरे ग्लोबल हब के मुकाबले ज्यादा है। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, चीन की तुलना में भारत में कॉस्ट 11-14% ज्यादा है। यह गैप भारत के ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट्स में लीडर बनने के लक्ष्य में बड़ी बाधा डाल रहा है। जबकि PLI स्कीम प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट को बढ़ावा दे रही है, कंपनियों को एफिशिएंसी सुधार या लगातार सपोर्ट के जरिए इस कॉस्ट डिसएडवांटेज को दूर करना होगा। इस गैप को पार करना कंपनियों के लिए PLI जैसे मौकों का पूरा फायदा उठाने के लिए अहम है। एक्सपोर्ट में लॉन्ग-टर्म लीडरशिप के लिए इस कॉस्ट डिफरेंस को कम करना जरूरी होगा, जिसके लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑटोमेशन और वर्कफोर्स ट्रेनिंग जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। (Dixon Technologies India Ltd. जैसे प्रमुख घरेलू मैन्युफैक्चरर का P/E रेश्यो 65.65 है, जो सेक्टर की ग्रोथ पोटेंशियल में निवेशकों का भरोसा दिखाता है।)

इंडस्ट्री ने मांगी PLI एक्सटेंशन, भविष्य की ग्रोथ के लिए

ग्लोबल ट्रेड की बदलती चाल और जियोपॉलिटिकल शिफ्ट्स के बीच, भारत का मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर PLI स्कीम को पांच साल बढ़ाने की मांग कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, सरकारी अधिकारी इस रिक्वेस्ट पर विचार कर रहे हैं, जो इंडस्ट्री के लिए एक लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजी का संकेत देता है। स्मार्टफोन PLI की कामयाबी दूसरे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स के लिए भी ऐसे ही इंसेंटिव प्रोग्राम के लिए गाइडलाइन का काम कर सकती है, जो दिखाता है कि कैसे परफॉरमेंस-बेस्ड सपोर्ट ग्रोथ और ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस को बढ़ावा दे सकता है। भले ही मौजूदा स्कीम 31 मार्च 2026 को खत्म हो रही है, लेकिन इसका असर एक इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को आकार देना जारी रखेगा। इंपोर्ट पर फोकस करने से लेकर एक्सपोर्ट में लीड करने तक का यह बदलाव, ग्लोबल सप्लाई चेन में गहरी इंटीग्रेशन के साथ, भारत को एक अहम इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेंटर के रूप में स्थापित करता है। फोकस कैपेबिलिटी बढ़ाने, कॉस्ट इश्यूज को सुलझाने और ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलावों का फायदा उठाकर ज्यादा प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट बढ़ाने पर बना रहेगा।

Disclaimer:This content is for informational purposes only and does not constitute financial or investment advice. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making decisions. Investments are subject to market risks, and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors are not liable for any losses. Accuracy and completeness are not guaranteed, and views expressed may not reflect the publication’s editorial stance.