डीपटेक में भारत की बड़ी छलांग
India (इंडिया) टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में वैश्विक लीडर बनने की राह पर है। देश का फोकस अब डीपटेक (Deeptech) इनोवेशन पर ज़ोर-शोर से है, ताकि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच अपनी क्षमताओं को मज़बूत किया जा सके। लक्ष्य है AI, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, बायोटेक, स्पेस, एडवांस मटेरियल और एनर्जी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पेटेंट-आधारित नवाचारों से ग्रोथ को गति देना। उदाहरण के लिए, एनर्जी सिस्टम को अगले दशक में मांग चार गुना बढ़ने के साथ ही स्मार्ट और विकेंद्रीकृत (decentralized) बनाने की ज़रूरत है। मैन्युफैक्चरिंग को भी ऑटोमेशन और रोबोटिक्स की ज़रूरत है ताकि आयात कम हो और एफिशिएंसी बढ़े। $690 बिलियन का एग्रीकल्चर सेक्टर भी ऐसे नवाचारों के मौके देता है जो जलवायु परिवर्तन का सामना कर सकें।
सरकारी सपोर्ट और स्टार्टअप्स की धूम
इस बदलाव को कई बड़े सरकारी कदम सहारा दे रहे हैं। ₹1 लाख करोड़ की रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (RDI) स्कीम, जिसमें डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के लिए शुरुआती ₹20,000 करोड़ हैं, ऐसे ही एक महत्वपूर्ण इनिशिएटिव है। ₹10,000 करोड़ का डीपटेक फंड ऑफ फंड्स भी निजी R&D को बढ़ावा देने के लिए लॉन्ग-टर्म, अफोर्डेबल लोन ऑफर कर रहा है। भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम भी ज़ोरों पर है, जो 200,000 से ज़्यादा रजिस्टर्ड स्टार्टअप्स के साथ दुनिया में तीसरे स्थान पर है। नए उद्यमी कॉम्प्लेक्स, पेटेंट-ड्रिवन समाधान विकसित कर रहे हैं, जिन्हें रिसर्च संस्थानों से भी सपोर्ट मिल रहा है।
बड़ी चुनौतियां: फंड, टैलेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर
इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद, India (इंडिया) के डीपटेक डेवलपमेंट में कई बड़ी रुकावटें आ रही हैं। सबसे बड़ी समस्या 'पेशेंट कैपिटल' (patient capital) की कमी है। डीपटेक प्रोजेक्ट्स को विकसित होने में अक्सर पांच साल से ज़्यादा लग जाते हैं, जो कि आम वेंचर कैपिटल (Venture Capital) निवेश के समय से काफी लंबा है। शुरुआती ग्रांट तो उपलब्ध हैं, लेकिन सीरीज़ A और उसके बाद के स्टेज के लिए फंड की भारी कमी है, जो रिसर्च और प्रोडक्शन को स्केल-अप करने के लिए बेहद ज़रूरी है। कई इन्वेस्टर डीपटेक को समझने में मुश्किल पाते हैं, जिससे फंड जुटाना कठिन हो जाता है। स्पेशलाइज्ड टैलेंट की कमी भी एक बड़ी समस्या है। भारत कई इंजीनियर तैयार करता है, लेकिन डीपटेक में सफलता के लिए टॉप साइंटिस्ट और एक्सपर्ट्स की कमी है, खासकर तब जब मल्टीनेशनल कंपनियां भी इन टैलेंट के लिए कॉम्पिटिशन कर रही हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी दिक्कतें भी चिंता का विषय बन रही हैं। AI और डेटा सेंटरों की तेज़ी से बढ़ती मांग बिजली की खपत को काफी बढ़ाएगी, जिससे मौजूदा पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ेगा और फ्लेक्सिबिलिटी व स्टोरेज के लिए बड़े अपग्रेड की ज़रूरत होगी। क्लीनरूम जैसी स्पेशलाइज्ड रिसर्च फैसिलिटी तक पहुंच भी सीमित है।
R&D खर्च में पिछड़ रहा भारत
भारत का रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर खर्च उसके GDP का महज़ 0.64-0.66% है। यह अमेरिका और चीन जैसे देशों द्वारा खर्च किए जाने वाले लगभग 2% और ग्लोबल एवरेज 1.18% से काफी कम है। भारत में प्राइवेट सेक्टर की तरफ से R&D फंडिंग का हिस्सा भी काफी छोटा है, जो लीडिंग इकोनॉमीज़ में 70% से ज़्यादा की तुलना में लगभग 36% है। हालांकि भारत इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन के लिए रोबोट इंस्टॉलेशन जैसे क्षेत्रों में सुधार कर रहा है, लेकिन एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजीज़ को अपनाने में यह ग्लोबल लीडर्स से अभी भी शुरुआती दौर में है। अमेरिका और चीन जैसे देशों के पास ज़्यादा डेवलप्ड डीपटेक सेक्टर्स और ज़्यादा निवेश है।
इनोवेशन में बड़े रोड़े
कई गहरी जड़ें जमा चुकी समस्याएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या India (इंडिया) अपने डीपटेक लक्ष्यों को आसानी से हासिल कर पाएगा। डीपटेक के लिए लंबा डेवलपमेंट टाइम अक्सर निवेशकों की जल्दी रिटर्न पाने की चाहत से टकराता है, जिससे लगातार फंडिंग की समस्या बनी रहती है। यूनिवर्सिटीज़ और व्यवसायों के बीच खराब लिंकेज नई तकनीकों को लैब से बाज़ार तक लाने की प्रक्रिया को धीमा कर देते हैं। अच्छे सरकारी नीतियों के बावजूद, लालफीताशाही (red tape) और रेगुलेशन को लेकर अनिश्चितता नए नवाचारों में देरी कर सकती है। आत्मनिर्भरता के प्रयासों के बावजूद, भारत अभी भी ज़रूरी पार्ट्स और अप्रूवल के लिए आयात पर निर्भर है। इसके अलावा, लोकल मार्केट अक्सर एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज़ को अपनाने में धीमा रहता है, जिसमें व्यवसायों और सरकारी निकायों को इन्हें लागू करने में काफी समय लगता है।
आगे का रास्ता
India (इंडिया) के पास एक मज़बूत डीपटेक सेक्टर बनाने के लिए ज़रूरी बुनियादी तत्व मौजूद हैं: डायनामिक एंटरप्रेन्योरियल स्पिरिट, बढ़ता टैलेंट पूल और सपोर्टिव सरकारी नीतियां। हालांकि, सफलता काफी हद तक मौजूदा एग्जीक्यूशन (execution) चुनौतियों को हल करने पर निर्भर करती है। इन्वेस्टमेंट क्लाइमेट अधिक सतर्क हो रहा है, जिसमें कैपिटल उन वेंचर्स की ओर जा रहा है जिनके पास क्लियर बिज़नेस प्लान, कमाई के तरीके और मज़बूत टीम हैं। सभी हितधारकों को एक साथ काम करते हुए वैज्ञानिक उपलब्धियों को बड़ी, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंपनियों में बदलना महत्वपूर्ण होगा जो व्यापक आर्थिक विकास में योगदान दें।