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India Data Center Boom: बिजली की 'अदृश्य दीवार' बन रही ग्रोथ की राह में रोड़ा

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India Data Center Boom: बिजली की 'अदृश्य दीवार' बन रही ग्रोथ की राह में रोड़ा
Overview

Artificial Intelligence (AI) और डिजिटलाइजेशन की बढ़ती मांग के चलते भारत का **डेटा सेंटर** सेक्टर तेजी से फल-फूल रहा है, लेकिन अब यह एक 'अदृश्य बाधा' से टकरा रहा है। अपर्याप्त बिजली ग्रिड, बिजली की अत्यधिक मांग, पानी की कमी और कनेक्टिविटी जैसी दिक्कतें इस सेक्टर की तूफानी रफ्तार पर ब्रेक लगा सकती हैं।

इंफ्रास्ट्रक्चर की मुश्किलों से टकराई तेज रफ्तार

भारत का डेटा सेंटर मार्केट जबरदस्त तेजी दिखा रहा है, जिसमें भारी निवेश और आक्रामक विस्तार हो रहा है। AI और तेजी से डिजिटाइज हो रही अर्थव्यवस्था के कारण भारत ग्लोबल डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में एक बड़ा खिलाड़ी बनने की राह पर है। अनुमान है कि साल 2030 तक क्षमता बढ़कर लगभग 4 GW हो जाएगी, जिसके लिए अगले पांच सालों में करीब ₹1.5 लाख करोड़ के निवेश की जरूरत होगी। इस सेक्टर में अब तक $126 अरब से ज्यादा का निवेश हो चुका है और 2026 तक यह $180 अरब को पार कर सकता है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में डेटा सेंटर अब चौथी सबसे पसंदीदा निवेश श्रेणी बन गए हैं।

बिजली ग्रिड पर बढ़ता दबाव

यह तेज रफ्तार भारत के बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी दबाव डाल रही है, जिसे 'अदृश्य बाधा' कहा जा रहा है। AI वर्कलोड को पारंपरिक सर्वर की तुलना में 10-15 गुना ज्यादा बिजली की जरूरत होती है, जिससे एनर्जी की मांग तेजी से बढ़ी है। अनुमान है कि 2030 तक डेटा सेंटर भारत की कुल बिजली का 2.5-3% इस्तेमाल कर सकते हैं, जो 2024 में लगभग 0.8% था। यह बढ़ती मांग बिजली उत्पादन और ट्रांसमिशन के विकास से कहीं आगे निकल रही है, जिससे सप्लाई-डिमांड का बड़ा गैप पैदा हो रहा है। हालांकि हाल ही में रिकॉर्ड 44.5 GW रिन्यूएबल कैपेसिटी जोड़ी गई है, लेकिन ग्रिड को स्टेबल करना, सबस्टेशन और ट्रांसमिशन लाइनों को अपग्रेड करना अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं, जिसमें सालों लग सकते हैं। यह मिसमैच नई डेटा सेंटर तैनाती को सीमित कर सकता है, भले ही कंस्ट्रक्शन कैपेसिटी कितनी भी हो।

पानी और कनेक्टिविटी की भी है दिक्कत

बिजली ग्रिड के अलावा, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे प्रमुख डेटा सेंटर हब पानी की कमी से भी जूझ रहे हैं। एक 20 MW की सुविधा हर दिन 1.4 मिलियन लीटर पानी की खपत कर सकती है, जिससे उन क्षेत्रों में पानी के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है। कनेक्टिविटी भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, खासकर टियर-II शहरों में जहां फाइबर नेटवर्क अभी विकसित हो रहे हैं। डेटा सेंटर के लिए प्रति MW की लागत भी बढ़ी है, जो पहले ₹40-45 करोड़ थी, अब बढ़कर औसतन ₹60-70 करोड़ हो गई है।

निवेशक का भरोसा और सरकारी सपोर्ट

इन चुनौतियों के बावजूद, निवेशक डेटा सेंटर में भारी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 2025 तक 19.4 GW का डेवलपमेंट पाइपलाइन है, और भारत इस क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है। भारत में कंस्ट्रक्शन की लागत अमेरिका और चीन से 30-40% कम है। सरकार भी इस सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठा रही है, जैसे टैक्स में छूट और पॉलिसी सपोर्ट। यूनियन बजट 2026-27 में फॉरेन क्लाउड प्रोवाइडर्स के लिए टैक्स हॉलिडे और डेटा सेंटर के लिए खास टैक्स ट्रीटमेंट का प्रस्ताव है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत की डेटा सेंटर ग्रोथ भविष्य में इंफ्रास्ट्रक्चर, खासकर बिजली, पानी और कनेक्टिविटी को तेजी से बढ़ाने और आधुनिक बनाने पर निर्भर करेगी।

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