भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स दांव: सेमीकंडक्टर और ग्राफीन में बड़ी तैयारी, पर राह में बाधाएँ!

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स दांव: सेमीकंडक्टर और ग्राफीन में बड़ी तैयारी, पर राह में बाधाएँ!
Overview

भारत अपनी इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम डिज़ाइन और मैन्युफैक्चरिंग (ESDM) क्षमताओं को तेज़ी से बढ़ा रहा है। सेमीकंडक्टर सेक्टर में बड़े निवेश और ग्राफीन जैसी एडवांस्ड मैटेरियल्स में बढ़ती रुचि के साथ, देश ग्लोबल हब बनने का लक्ष्य रख रहा है। India Semiconductor Mission और Design Linked Incentive Scheme जैसी नीतियों के ज़रिए यह महत्त्वाकांक्षी यात्रा शुरू हुई है, लेकिन यह राह कड़े ग्लोबल कॉम्पिटिशन और सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन को बढ़ाने तथा ग्राफीन को लैब से बाज़ार तक लाने जैसी बड़ी तकनीकी और कमर्शियलाइजेशन चुनौतियों से भरी है।

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भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स और एडवांस्ड मैटेरियल्स में बड़ी चाल

भारत एक मज़बूत पॉलिसी सपोर्ट और भारी भरकम निवेश के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम डिज़ाइन और मैन्युफैक्चरिंग (ESDM) में ग्लोबल स्तर पर अपनी जगह मज़बूत कर रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम को बढ़ावा देने के लिए कई पहलें की हैं। यह पहल सिर्फ़ उत्पादन क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि एडवांस्ड मैटेरियल्स में इनोवेशन को भी बढ़ावा दे रही है। इसका एक उदाहरण हाल ही में भारत में आयोजित ग्राफीन (Graphene) और टू-डायमेंशनल (2D) मैटेरियल्स पर पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन और एक्सपो, GraphIN 2026 है। ये प्रयास 'मेक इन इंडिया' (Make in India) और 'डिजिटल इंडिया' (Digital India) जैसे फ्लैगशिप प्रोग्राम्स का अहम हिस्सा हैं, जिनका लक्ष्य घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट क्षमताओं को बढ़ाना है।

सेमीकंडक्टर में दांव: निवेश और महत्त्वाकांक्षा

भारत की रणनीति का मुख्य स्तंभ इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) है, जिसने छह राज्यों में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े दस प्रस्तावों को मंज़ूरी दी है, जिनका कुल मूल्य लगभग ₹1.6 लाख करोड़ (US$19.2 बिलियन) है। सरकार वित्तीय सहायता भी दे रही है, जिसमें सिलिकॉन फैब्स (silicon fabs) और संबंधित सुविधाओं के लिए प्रोजेक्ट लागत का 50% तक इंसेंटिव शामिल है। इसी कड़ी में, 'सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम' (Semicon India Programme) के तहत डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) स्कीम घरेलू स्टार्टअप्स (startups) और MSMEs को सक्रिय रूप से समर्थन दे रही है। यह स्कीम वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है, जिसमें प्रोडक्ट डिज़ाइन के लिए 50% तक की रीइंबर्समेंट (₹15 करोड़ तक सीमित) और नेट सेल्स पर आधारित डिप्लॉयमेंट-लिंक्ड इंसेंटिव शामिल हैं। इन उपायों का उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को ग्लोबल सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन के ऊँचे पायदान पर स्थापित करना है। सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले फैब इकोसिस्टम के लिए बड़े मॉडिफाइड प्रोग्राम के तहत भारत को ग्लोबल ESDM हब बनाने के लिए 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश प्रस्तावित है। जहाँ 2023 में भारत के घरेलू सेमीकंडक्टर बाज़ार का मूल्य लगभग 38 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, वहीं 2030 तक इसके 100-110 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है, जो बाज़ार की बड़ी विकास क्षमता को दर्शाता है। इसके बावजूद, भारत अपनी ज़रूरत का 90-95% सेमीकंडक्टर चिप्स आयात करता है।

ग्राफीन: लैब से बाज़ार तक का सफर और चुनौतियाँ

GraphIN 2026 में नोबेल पुरस्कार विजेता कोस्त्या नोवोसेलोव (Kostya Novoselov) की मौजूदगी में हुई चर्चाओं ने ग्राफीन के लैब की खोज से लेकर बड़े तकनीकी संभावनाओं वाले मैटेरियल के रूप में इसके विकास को उजागर किया। इसके असाधारण इलेक्ट्रॉनिक, थर्मल और मैकेनिकल गुण इसे अगली पीढ़ी की टेक्नोलॉजी के लिए एक महत्वपूर्ण मैटेरियल बनाते हैं। हालांकि, वैज्ञानिक वादों को बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपयोग में बदलने की राह चुनौतियों से भरी है। मुख्य बाधाओं में बड़े पैमाने पर उच्च-गुणवत्ता वाले ग्राफीन का उत्पादन करना, एटॉमिक-लेवल की सटीकता बनाए रखना और उत्पादन की मात्रा बढ़ने के साथ मैटेरियल की निरंतरता सुनिश्चित करना शामिल है। मौजूदा मैटेरियल्स के साथ मूल्य प्रतिस्पर्धा भी इसके उपयोग को सीमित करती है, क्योंकि कई क्षेत्र कम लागत पर पारंपरिक मैटेरियल्स से स्वीकार्य प्रदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। इन बाधाओं के बावजूद, ग्लोबल ग्राफीन बाज़ार बढ़ रहा है, जिसके 2024 में 1.32 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2028 तक 2.98 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है।

सेक्टर की सेहत और बाज़ार संकेत

भारत का ESDM सेक्टर मज़बूत विकास देख रहा है, जहाँ 2023 में इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट 23.57 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। भारतीय इक्विटी बाज़ार (equity market) का प्रतिनिधित्व करने वाले निफ्टी 50 (NIFTY 50) इंडेक्स में 6 मार्च 2026 को 1.27% की गिरावट आई और यह 24,450.45 पर बंद हुआ। इसी तारीख को निफ्टी 50 का P/E रेश्यो 21.39 था। हालाँकि इस घटना से सीधे तौर पर जुड़ी कंपनियों के P/E और मार्केट कैपिटलाइज़ेशन (market capitalization) के आंकड़े गतिशील हैं, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग स्पेस के प्रमुख खिलाड़ी जैसे डिक्सन टेक्नोलॉजीज (Dixon Technologies), सिरमा एसजीएस टेक्नोलॉजी (Syrma SGS Technology) और काइन्स टेक्नोलॉजी (Kaynes Technology) इकोसिस्टम की विकास क्षमता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नेशनल पॉलिसी ऑन इलेक्ट्रॉनिक्स 2019 (NPE 2019) और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम्स जैसी नीतियाँ लागू की हैं।

असली चुनौतियाँ और बाज़ार की कमजोरियाँ

भारत के ठोस प्रयासों के बावजूद, सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड मैटेरियल्स के क्षेत्र में एक पावरहाउस बनने का रास्ता कठिन और प्रतिस्पर्धी है। ग्लोबल सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग काफी हद तक ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों पर केंद्रित है। अमेरिका और यूरोपीय संघ भी अपनी घरेलू उत्पादन क्षमताओं को बढ़ाने के लिए CHIPS Act जैसे बड़े इंसेंटिव दे रहे हैं, जिनका लक्ष्य 2030 तक वैश्विक हिस्सेदारी 20% हासिल करना है। चीन का सरकारी नेतृत्व वाला दृष्टिकोण स्वायत्तता को प्राथमिकता देता है, हालाँकि वह लेटेस्ट चिप टेक्नोलॉजी में पीछे है। भारत के लिए, एडवांस्ड फैब्स के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भरता एक बड़ी कमजोरी बनी हुई है, साथ ही सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में भारी पूंजी निवेश (capital expenditure) और लंबे समय की आवश्यकता भी एक चुनौती है। जटिल प्रक्रियाओं को संभालने में सक्षम कुशल कार्यबल का विकास एक और महत्वपूर्ण बाधा है; ऐतिहासिक रूप से, भारत का मैन्युफैक्चरिंग कम-मूल्य वाली असेंबली पर केंद्रित रहा है, और कुशल श्रमिकों की कमी एक लगातार समस्या रही है। ग्राफीन के क्षेत्र में, उत्पादन को बड़े पैमाने पर ले जाने में उच्च लागत और कठिनाई का मतलब है कि मास-मार्केट उत्पादों में इसका एकीकरण सीमित है, जिसमें कमर्शियलाइज़ेशन मुख्य रूप से कच्चे माल की बिक्री पर केंद्रित है। भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार प्रतिबंध वैश्विक सप्लाई चेन को और जटिल बनाते हैं, जो भारत के आयात-निर्भर इकोसिस्टम में जोखिम की एक और परत जोड़ता है।

भविष्य की राह

भारत इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 की घोषणा के साथ सेमीकंडक्टर डेवलपमेंट के अगले चरण की तैयारी कर रहा है, जो अगले पाँच से छह वर्षों तक इस सेक्टर के लिए निरंतर दीर्घकालिक नीतिगत समर्थन का संकेत देता है। इस निरंतर फोकस का उद्देश्य शुरुआती मिशन से उत्पन्न गति को बनाए रखना और संप्रभु (sovereign) तकनीकी क्षमताओं के विकास के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को मज़बूत करना है। सरकार की नीति AI (Artificial Intelligence) अनुप्रयोगों के लिए कंप्यूटिंग पावर तक पहुँच सुनिश्चित करने पर ज़ोर देती है, जिससे यह वैश्विक दरों की तुलना में काफी कम लागत पर उपलब्ध हो सके। भविष्य में विकास को बढ़ती घरेलू मांग, सरकारी प्रोत्साहन और रणनीतिक अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों से बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जो भारत को केवल एक उपभोक्ता के बजाय वैश्विक चिप इकोसिस्टम में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में स्थापित करेगा।

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