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CCTV पर बैन: भारत में घरेलू टेक को बूस्ट, पर चिप्स की है मुश्किल

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AuthorMehul Desai|Published at:
CCTV पर बैन: भारत में घरेलू टेक को बूस्ट, पर चिप्स की है मुश्किल
Overview

भारत सरकार ने **1 अप्रैल 2026** से गैर-प्रमाणित (non-certified) विदेशी इंटरनेट-कनेक्टेड CCTV कैमरों और उनके कंपोनेंट्स के आयात पर रोक लगा दी है। इस बड़े फैसले से घरेलू निगरानी (surveillance) मार्केट में बड़ा बदलाव आने वाला है, जिसका मकसद देश की अपनी टेक कंपनियों को आगे बढ़ाना है। हालांकि, यह कदम भारत की चिप्स (Chips) पर वैश्विक निर्भरता को भी उजागर करता है।

बदल रहा है CCTV मार्केट का नक्शा

यह नई पॉलिसी, जो अप्रैल 2024 में आए जरूरी नियमों के बाद लागू होगी, खास तौर पर चीनी चिपसेट (chipsets) और फर्मवेयर (firmware) वाले हार्डवेयर को टारगेट करती है। इसका मतलब है कि Hikvision और Dahua जैसी बड़ी विदेशी कंपनियां भारत के बढ़ते Surveillance मार्केट से बाहर हो जाएंगी। माना जा रहा है कि इससे घरेलू निर्माताओं का मार्केट शेयर 80% तक पहुंच सकता है। CP PLUS जैसी कंपनियां, जिनका अभी शेयर 25% से कम है, उनका हिस्सा बढ़कर करीब 50% हो सकता है। सप्लाई चेन के बदलने से प्रोडक्ट्स की कीमतें 15-20% तक बढ़ सकती हैं।

चुनौती: लोकल चिप्स बनाम ग्लोबल सप्लाई

सच्ची घरेलू टेक्नोलॉजी के राह में एक बड़ी बाधा है - भारत का उभरता हुआ सेमीकंडक्टर (semiconductor) इंडस्ट्री, खासकर लोकल सिस्टम-ऑन-चिप (SoC) प्रोडक्शन की कमी। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि इस सेक्टर में कंपनियों को प्रोडक्ट तैयार करने में 3 से 5 साल का समय लग सकता है। फिलहाल, SoC मार्केट पर अमेरिका, साउथ कोरिया, ताइवान और चीन की दिग्गज कंपनियां जैसे Samsung, Apple, Qualcomm, MediaTek और Intel का दबदबा है।

सरकारी पहलों से चिप मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा

भारत सरकार इंपोर्टेड माइक्रोचिप्स (microchips) पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए बड़े कदम उठा रही है। 2021 में लॉन्च की गई 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' (India Semiconductor Mission - ISM) के तहत अब ₹1 ट्रिलियन (लगभग $11 बिलियन) का फंड है। यह 'मेक इन इंडिया' (Make in India) और 'आत्मनिर्भर भारत' (Atmanirbhar Bharat) का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य चिप बनाने के पूरे इकोसिस्टम को विकसित करना है, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग इक्विपमेंट, केमिकल्स और वेफर्स जैसी चीजें भी शामिल हैं, जो फिलहाल इंपोर्ट की जाती हैं।

चिप निर्माण के रास्ते में अभी भी रुकावटें

सरकारी सपोर्ट के बावजूद, देश में चिप मैन्युफैक्चरिंग (chip manufacturing) खड़ा करना एक मुश्किल काम है। भारत के पिछले सेमीकंडक्टर प्लान्स पुरानी टेक्नोलॉजी, कम फंडिंग और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी दिक्कतों से जूझ चुके हैं। एक चिप फैक्ट्री लगाने में अनुमानित $5-7 बिलियन का खर्च आता है और इसके लिए लगातार बिजली व एडवांस टेक्नोलॉजी की जरूरत होती है। फिलहाल, यह सेक्टर ज्यादातर असेंबली पर निर्भर है, असली वैल्यू डिजाइन और टेक्नोलॉजी ओनरशिप में है।

आत्मनिर्भरता की ओर भारत का रास्ता

चीनी कंपनियां Hikvision और Dahua, जो अपनी एडवांस AI के लिए जानी जाती थीं, अब बैन का सामना कर रही हैं। कुछ लोग इसे राजनीतिक व्यापारिक भेदभाव भी मान रहे हैं। स्थानीय स्तर पर SoCs बनाने की लंबी समय-सीमा और भारी लागत को देखते हुए, इस अहम सेक्टर में भारत की रणनीतिक पकड़ हासिल करने में कई साल लगेंगे, और एडवांस क्षमताएं शायद 2032 तक ही आ पाएंगी। हालांकि, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स को उम्मीद है कि अगले 2-3 साल में भारतीय चिप क्षमताएं बेहतर होंगी, जिससे निगरानी (surveillance) में इनका इस्तेमाल बढ़ सकेगा। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद डेटा सुरक्षा (data security) को मजबूत करना और चीन पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ एक आत्मनिर्भर इलेक्ट्रॉनिक्स और चिप इकोसिस्टम बनाना है।

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