भारत का बड़ा प्लान: 2047 तक बैटरी हब बनने की तैयारी!
भारत अपने ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने और 'विकसित भारत विजन 2047' को साकार करने के लिए बैटरी मैन्युफैक्चरिंग में बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। देश की एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरियों की मांग साल 2025 में 28 GWh से बढ़कर साल 2040 के मध्य तक 700 GWh से अधिक होने का अनुमान है। इस विशाल जरूरत को पूरा करने के लिए, भारत सिर्फ सेल असेंबली पर नहीं, बल्कि रॉ मैटेरियल्स, कंपोनेंट्स और रीसाइक्लिंग तक एक मजबूत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम बनाने पर जोर दे रहा है।
घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्यों है ज़रूरी?
बैटरी की बढ़ती मांग के साथ, भारत के लिए आत्मनिर्भरता का यह कदम बेहद अहम है। हालांकि, अभी देश की इंस्टॉल्ड बैटरी कैपेसिटी 1 GWh से भी कम है, लेकिन साल 2030 तक यह 120-170 GWh तक पहुंचने का अनुमान है। इस दिशा में सरकार प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम जैसी योजनाओं के साथ-साथ क्रिटिकल मिनरल्स और बैटरी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए बजट में भी आवंटन कर रही है।
LFP पर फोकस: लागत और सुरक्षा का डबल फायदा
भारत की कुल बैटरी डिमांड में साल 2047 तक Lithium Iron Phosphate (LFP) बैटरियों की हिस्सेदारी 60% से अधिक रहने की उम्मीद है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण LFP की लागत में जबरदस्त बचत है। ग्लोबली, LFP पैक की कीमत लगभग $81/kWh है, जबकि निकेल मैंगनीज कोबाल्ट (NMC) केमिस्ट्री की कीमत $128/kWh तक जाती है। LFP सेल्स, NMC सेल्स के मुकाबले 50% तक सस्ती हो सकती हैं। साथ ही, LFP की बेहतरीन थर्मल स्टेबिलिटी और बढ़ी हुई सेफ्टी प्रोफाइल इसे भरोसेमंद और किफायती एनर्जी स्टोरेज के लिए एक आदर्श विकल्प बनाती है।
सप्लाई चेन और भू-राजनीतिक जोखिमों से बचाव
बैटरी के लिए जरूरी क्रिटिकल मिनरल्स, जैसे लिथियम, निकेल और कोबाल्ट की ग्लोबल सप्लाई चेन में महत्वपूर्ण भौगोलिक एकाग्रता देखी जाती है। चीन दुनिया के 75% से ज़्यादा बैटरी मार्केट पर कब्ज़ा रखता है। यह स्थिति भारत के लिए भू-राजनीतिक जोखिम पैदा करती है, जिसमें सप्लाई में रुकावट और कीमतों में उतार-चढ़ाव शामिल है। इन कमजोरियों को दूर करने के लिए, भारत खनिज सोर्सिंग के लिए अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियां कर रहा है और लिथियम व निकेल जैसे क्रिटिकल मैटेरियल्स की डोमेस्टिक प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने के लिए सरकारी इंसेंटिव (जैसे 15% तक कैपिटल सब्सिडी) दे रहा है।
क्षमता विस्तार और ग्लोबल पोजीशन
बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए, भारत अपनी बैटरी मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी को तेजी से बढ़ा रहा है। साल 2030 तक 120-170 GWh और साल 2035 तक 246 GWh का लक्ष्य रखा गया है। PLI स्कीम और बड़े प्राइवेट निवेश इस ग्रोथ को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत का लक्ष्य न सिर्फ घरेलू जरूरतों को पूरा करना है, बल्कि अमेरिका और यूरोप जैसे बाजारों में एक्सपोर्ट करना भी है, 'चाइना + 1' स्ट्रेटेजी का फायदा उठाते हुए। यूनियन बजट 2026-27 में कस्टम ड्यूटी में छूट, एनर्जी स्टोरेज के लिए इंसेंटिव और डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर की स्थापना जैसे प्रावधानों ने इस महत्वाकांक्षा को और मजबूत किया है। हालांकि चीन अभी ग्लोबल बैटरी मैन्युफैक्चरिंग में सबसे आगे है, लेकिन भारत का रणनीतिक फोकस, खासकर लागत-प्रभावी और मजबूत LFP टेक्नोलॉजी पर, उसे इस महत्वपूर्ण भविष्य के बाजार में एक बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने की राह पर ले जा रहा है।
