भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की इस महत्वपूर्ण दौड़ में सिर्फ एक 'फॉलोअर' बनकर न रह जाए, यह सुनिश्चित करना सिर्फ तकनीकी प्रगति के लिए ही नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक कमाई के लिए भी बेहद जरूरी है। अगर देश ने अपनी AI क्षमताएं खुद विकसित नहीं कीं, तो यह उस बड़े आर्थिक फायदे को गंवा सकता है जो AI के विकास प्रक्रिया के स्वामित्व से मिलता है। इतिहास गवाह है कि ऐसे बड़े औद्योगिक बदलावों में सबसे बड़ा मूल्य निर्माण अक्सर वैश्विक दिग्गजों को ही मिला है।
भारत को अपना AI क्यों बनाना है?
उद्योग जगत के नेताओं का मानना है कि भारत को AI पावरहाउस बनने के लिए विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहने के बजाय, अपनी AI क्षमताएं, विश्वसनीय इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उत्पाद खुद बनाने होंगे। 'डोमेस्टिक AI' की यह मंशा इस बात से उपजी है कि AI भविष्य के आर्थिक विकास का आधार बनने वाला है। AI के तेजी से हो रहे विकास को देखते हुए इस काम में देरी नहीं की जा सकती।
इस दिशा में बड़े निवेश हो रहे हैं। डाटा सेंटर्स की क्षमता 2030 तक 5 गुना बढ़कर 8 GW से अधिक होने का अनुमान है। Yotta Data Services जैसी कंपनियां AI सुपरक्लस्टर्स बनाने के लिए 2 अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर रही हैं। वे अगस्त 2026 तक हजारों Nvidia Blackwell GPUs तैनात करने की योजना बना रही हैं, जिससे भारत भी बड़े पैमाने पर AI इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने वाले कुछ देशों में शामिल हो जाएगा। यह जटिल AI मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। Sarvam AI जैसी कंपनियां भी एक खरब (trillion) पैरामीटर वाले मॉडल को ट्रेन करने पर काम कर रही हैं, जिसे IndiaAI Mission का भी समर्थन मिल रहा है।
डेटा से आर्थिक लाभ कैसे?
इंफ्रास्ट्रक्चर से परे, एक बड़ी चुनौती यह है कि भारत अपने विशाल डेटा को उसके अनुपात में आर्थिक मूल्य में बदलने में संघर्ष कर रहा है। भारत में भारी मात्रा में डिजिटल कंटेंट और डेटा उत्पन्न होता है, लेकिन इसका बहुत सारा मूल्य फिलहाल वैश्विक प्लेटफॉर्म्स को ही मिल रहा है। इस असंतुलन को दूर करने के लिए ऐसे डोमेस्टिक AI मॉडल्स और सिस्टम की आवश्यकता है जो स्थानीय डेटा को प्रोसेस कर सकें और उससे मुनाफा कमा सकें।
Sarvam AI, जिसे Pratyush Kumar और Vivek Raghavan ने शुरू किया है, इस क्षेत्र में एक अहम खिलाड़ी है। वे भारतीय भाषाओं और विशिष्ट उपयोगों के लिए डिज़ाइन किए गए बड़े भाषा मॉडल (LLMs) विकसित कर रहे हैं। कंपनी कथित तौर पर 1.5 से 1.6 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर एक बड़े फंडिंग राउंड के करीब है, जो भारत की डोमेस्टिक AI पहलों में मजबूत निवेशक रुचि को दर्शाता है। समग्र भारतीय AI बाजार में भी जबरदस्त वृद्धि का अनुमान है, जो 2032 तक बढ़कर 27.7 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जिसकी कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) 19.2% रहने की उम्मीद है। घरेलू क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करना उन पुरानी गलतियों को दोहराने से बचने के लिए आवश्यक है, जहां भारत मुख्य रूप से एक उपयोगकर्ता था और प्रमुख मूल्य निर्माण से चूक गया था।
नौकरियों और कौशल पर AI का असर
AI के तेजी से हो रहे विकास से भारत के कार्यबल के लिए अवसर और चुनौतियां दोनों खड़ी हो गई हैं। जहां AI से लाखों नई नौकरियां बनने की उम्मीद है, वहीं विनिर्माण और खुदरा जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण नौकरी के नुकसान का भी अनुमान है। अनुमान है कि AI 2030 तक 40 मिलियन (4 करोड़) नई नौकरियां पैदा कर सकता है, लेकिन ऑटोमेशन के कारण लाखों नौकरियां खत्म भी हो सकती हैं। इसके लिए बड़े पैमाने पर री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग कार्यक्रमों की आवश्यकता होगी। भविष्य के जॉब मार्केट और वैल्यू क्रिएशन को लेकर अनिश्चितता AI के व्यापक प्रभाव को दर्शाती है। भारत की AI रणनीति की सफलता इस बात से जुड़ी है कि वह अपने कार्यबल को इन परिवर्तनकारी बदलावों के लिए कैसे तैयार करता है।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना
मजबूत घरेलू प्रगति और बढ़ते निवेश के बावजूद, भारत को तीव्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, चीन AI को भौतिक कार्यों और रोबोटिक्स में तेजी से आगे बढ़ा रहा है, जिसमें लिडार सेंसर जैसे प्रमुख घटकों को नियंत्रित करना और औद्योगिक रोबोट इंस्टॉलेशन में नेतृत्व करना शामिल है। चीन का एकीकृत दृष्टिकोण, रोबोटिक्स पार्ट्स के लिए अपनी EV सप्लाई चेन का उपयोग करना, लागत लाभ और भौतिक अनुप्रयोगों में AI के भविष्य पर हावी होने की एक स्पष्ट रणनीति प्रदान करता है। भौतिक कार्यों के लिए AI में यह बढ़त, जहां मशीनें वास्तविक दुनिया में स्वायत्त रूप से काम करती हैं, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है। इसके अलावा, वैश्विक AI कंप्यूटिंग पावर कुछ टेक दिग्गजों के बीच केंद्रित है, जिससे विदेशी सेमीकंडक्टर और क्लाउड सेवाओं पर निर्भरता पैदा होती है। हालांकि भारत अपने डेटा सेंटर क्षमता का विस्तार कर रहा है, विदेशी निर्मित चिप्स और मुख्य AI मॉडलों पर निर्भरता एक महत्वपूर्ण कमजोरी बनी हुई है। एक स्पष्ट राष्ट्रीय AI रणनीति के बिना, कार्यान्वयन में बाधा आ सकती है, जिससे भारत की 'टेक फॉलोअर' की भूमिका और मजबूत हो सकती है। निवेशकों के लिए, AI की यह दौड़ तेजी से मूल्य हासिल करने के बारे में है। रणनीति या इंफ्रास्ट्रक्चर में कोई भी चूक प्रतिस्पर्धियों को महत्वपूर्ण आर्थिक जमीन सौंप सकती है।
भारत के AI भविष्य के लिए अगले कदम
इस जटिल परिदृश्य को नेविगेट करने के लिए निजी उद्योग, सरकार और शिक्षा जगत के समन्वित प्रयास की आवश्यकता है। उद्योग जगत के नेता वैश्विक टेक फर्मों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए AI इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च एंड डेवलपमेंट में पर्याप्त निजी निवेश पर जोर देते हैं। इसमें केवल कंप्यूटिंग पावर ही नहीं, बल्कि स्थानीय प्रतिभा का विकास और AI अपनाने के जोखिमों को संबोधित करना भी शामिल है। वक्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय AI कंपनियों तक पहुंच को प्रतिबंधित करने के बजाय, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी टेक फर्मों के निर्माण पर सहमति व्यक्त की। Yotta Data Services जैसी कंपनियों द्वारा समर्थित मजबूत स्थानीय डेटा सेंटर क्षमता महत्वपूर्ण है, भले ही चिप सप्लाई चेन वैश्विक बनी हुई हो। आगे का रास्ता एक समन्वित रणनीति की मांग करता है जहां महत्वपूर्ण बिंदुओं पर घरेलू नियंत्रण विकसित करने से केवल जोखिम कम करने के बजाय नवाचार और दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा मिले।
