डेटा सेंटर हब बनने का बड़ा मौका, पर बिजली है मुख्य बाधा
एशिया प्रशांत (APAC) क्षेत्र में भारत के पास एक बड़ा डेटा सेंटर हब बनने का जबरदस्त मौका है। कम लागत, जमीन की कीमतें, बिजली की दरें और AI स्किल्ड टैलेंट का बड़ा पूल, ये सब भारत के पक्ष में हैं। देश की डिजिटल इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है, और दुनिया के कुल डेटा खपत में भारत की हिस्सेदारी करीब 20% है। हालांकि, डेटा सेंटर की क्षमता में भारत अभी वैश्विक हिस्सेदारी का 5% से भी कम रखता है, जो दिखाता है कि यहां विस्तार की काफी गुंजाइश है।
सरकार भी इस क्षेत्र को बढ़ावा दे रही है। बजट 2026-27 में, भारत से दुनिया भर में क्लाउड सेवाएं देने वाली विदेशी कंपनियों को 2047 तक टैक्स हॉलिडे (Tax Holiday) का ऐलान किया गया है। इससे भारत में ग्लोबल क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर को आकर्षित करने की उम्मीद है। अनुमान है कि 2030 तक APAC क्षेत्र में डेटा सेंटर में करीब $800 बिलियन का निवेश आएगा, जिसका 40% भारत में आ सकता है। भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2025 में लगभग 1.5 GW से बढ़कर 2030 तक 8-10 GW तक पहुंचने का अनुमान है। कुल निवेश FY35 तक $70 बिलियन तक पहुंच सकता है। अडानी ग्रुप जैसी कंपनियां AI इंफ्रास्ट्रक्चर और सस्टेनेबल डेटा सेंटर के लिए 2035 तक $100 बिलियन निवेश करने की योजना बना रही हैं।
AI की बिजली की जरूरत बन रही सबसे बड़ी चुनौती
डेटा सेंटर की बढ़ती क्षमता, खासकर AI वर्कलोड के लिए, एक बड़ी ऊर्जा चुनौती पेश कर रही है। AI के कारण बिजली की मांग तेजी से बढ़ सकती है, और 2030 तक हर साल 40-45 टेरावाट-घंटे (TWh) अतिरिक्त बिजली की जरूरत पड़ सकती है। इससे सेक्टर का राष्ट्रीय बिजली खपत में हिस्सा लगभग 0.8% से बढ़कर 2.5-3% हो जाएगा। AI-केंद्रित रैक पारंपरिक रैक की तुलना में 10 से 15 गुना ज्यादा बिजली खींच सकते हैं। AI लोड 24/7 चलते हैं, इसलिए इन्हें लगातार और बिना किसी रुकावट के बिजली चाहिए, जो ग्रिड पर भारी दबाव डालता है।
ग्रिड की अस्थिरता और रेगुलेटरी दिक्कतें खड़ी कर रही मुश्किलें
स्ट्रक्चरल फायदे और सरकारी मदद के बावजूद, पावर और ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी गंभीर समस्याएं भारत के डेटा सेंटर हब बनने के सपने को बाधित कर रही हैं। डेटा सेंटर को बिना रुकावट और समर्पित बिजली सप्लाई की जरूरत होती है। लेकिन, राज्यों में रिन्यूएबल एनर्जी बैंकिंग नियमों, ओपन एक्सेस चार्ज, क्रॉस-सब्सिडी और टैरिफ में अंतर के कारण डेवलपर्स के लिए काफी अनिश्चितता है। ग्रिड की अस्थिरता और पॉवर कॉरिडोर में सबस्टेशन की सीमित क्षमता के कारण भी दिक्कतें आ रही हैं।
महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में 2030 तक पीक डिमांड में 2-3 GW की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे इन राज्यों के ग्रिड पर भारी दबाव पड़ेगा। भारत के पावर सेक्टर का बिखरा हुआ रेगुलेटरी ढांचा भी एक बड़ी समस्या है। ऐसे में, डेलॉयट (Deloitte) जैसी संस्थाएं सलाह दे रही हैं कि सौर-पवन हाइब्रिड मॉडल के साथ स्टोरेज समाधान अपनाकर AI वर्कलोड के लिए 24/7 बिजली सप्लाई सुनिश्चित की जाए। ट्रांसमिशन नेटवर्क को अपग्रेड करने, पावर-रेडी इकोनॉमिक जोन बनाने और राज्यों में रिन्यूएबल बैंकिंग नीतियों को स्टैंडर्डाइज करने की जरूरत है। अगर इन मुद्दों पर जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो भारत को कनेक्शन में देरी, बढ़ती ऊर्जा लागत और ग्रिड अस्थिरता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जिससे वह APAC मार्केट में पिछड़ सकता है।