AI Summit का आईना: 'नवाचार का दिखावा' चिंताजनक
AI Impact Summit 2026 में एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई है। जहाँ देश AI में 'सुपरपावर' बनने का सपना देख रहा है, वहीं प्रदर्शन का तरीका चिंताजनक है। एक संस्था ने इंपोर्टेड टेक्नोलॉजी को 'स्वदेशी' बताकर दिखाया, और कुछ जगहों पर इंपोर्टेड ड्रोन प्रोडक्ट्स भी प्रदर्शित हुए। यह बताता है कि असली 'इनोवेशन' पर ध्यान देने के बजाय, हम 'नवाचार का दिखावा' (innovation theater) करने में लगे हैं। सिस्टम ऐसा बन गया है जहाँ असली रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) की जगह, गिनती पूरी करने पर जोर है। AI में लीड करने के लिए असली उपलब्धियां चाहिए, सिर्फ घोषणाएं नहीं।
पेटेंट का विरोधाभास: मात्रा पर जोर, गुणवत्ता पर नहीं
भारत पेटेंट एप्लीकेशन के मामले में दुनिया में पांचवें नंबर पर है, लेकिन AI से जुड़े पेटेंट ग्रांट (अनुमोदन) की दर सिर्फ 0.37% है। शैक्षणिक संस्थानों के लिए यह दर और भी कम, करीब 1% है। वहीं, बड़ी कंपनियों में यह दर लगभग 40% तक है। IITs और IISc जैसे प्रीमियर संस्थानों का प्रदर्शन शानदार है, जहाँ IITs का ग्रांट रेट 64% (2020-2023) और IISc का करीब 68% है। NITs भी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन कई बड़ी प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़, हजारों एप्लीकेशन भरने के बावजूद, सिर्फ 1.87% से 2.8% का ग्रांट रेट दिखा रही हैं। यह बताता है कि सिस्टम फाइलिंग को बढ़ावा दे रहा है, न कि असरदार और व्यावसायीकरण योग्य बौद्धिक संपदा (intellectual property) बनाने को।
इंसेटिव स्ट्रक्चर 'इनोवेशन थिएटर' को दे रहे हैं बढ़ावा
इस समस्या की जड़ें सरकारी नीतियों में हैं। हर डोमेस्टिक पेटेंट फाइलिंग पर ₹2 लाख तक का सरकारी रिइम्बर्समेंट (वापसी), शैक्षणिक संस्थानों के लिए भारी फीस छूट, और नेशनल इंस्टी ट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) में पेटेंट संख्या को रैंकिंग का हिस्सा बनाना - ये सब मिलकर एक बड़ा आर्थिक प्रोत्साहन (financial incentive) पैदा करते हैं। ऊँची रैंकिंग से ज़्यादा एडमिशन और रेवेन्यू मिलता है, इसलिए पेटेंट फाइल करना सस्ता और तेज़ रास्ता बन गया है। यह चीन जैसे देशों के बिल्कुल विपरीत है, जिन्होंने वैज्ञानिक नवाचार को औद्योगिक विकास से सफलतापूर्वक जोड़ा है, जहाँ 2020 से 2024 के बीच टेक्नोलॉजी कॉन्ट्रैक्ट वॉल्यूम में 141.7% की वृद्धि देखी गई। जापान भी 60-70% पेटेंट ग्रांट रेट बनाए हुए है।
सिस्टम की कमजोरियां: मिस हुई बड़ी ऑपर्चुनिटीज़
असली दिक्कत यह है कि सिस्टम क्वांटिटेटिव (मात्रात्मक) मेट्रिक्स को क्वालिटी (गुणात्मक) नतीजों से ज़्यादा अहमियत दे रहा है। पेटेंट का कमर्शियलाइजेशन (व्यावसायीकरण) रेट दुनिया भर में 5-10% है, जो भारत में भी NIT Rourkela जैसे संस्थानों में 10-15% के आसपास है। इसका मतलब है कि ज़्यादातर 'इनोवेशन' सिर्फ कॉन्सेप्ट के स्तर पर ही रह जाते हैं, जिनका कोई कमर्शियल प्लान नहीं होता। भारत का रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर GDP का खर्च 0.6% से 0.8% के बीच है, जो दक्षिण कोरिया ( 4.9%) या चीन ( 2.4%) जैसे देशों से काफी कम है। खास तौर पर प्राइवेट सेक्टर का योगदान 36% ही है, जबकि चीन और दक्षिण कोरिया में यह 70% से ज़्यादा है। 'ट्रांसलेशनल रिसर्च' (अनुसंधान को व्यवहार में लाना) की कमी के कारण अकादमिक आउटपुट और बाज़ार की ज़रूरतों के बीच एक खाई बन गई है, जहाँ पेटेंट को मंजिल मान लिया गया है, पड़ाव नहीं। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सिस्टम अब 'एक्टिविटी' को रिवॉर्ड कर रहा है, 'रिजल्ट' को नहीं।
आगे का रास्ता: महत्वाकांक्षा को हकीकत में बदलना
भारत के पास AI में एक बड़ा पावरहाउस बनने की सारी क्षमताएं हैं। हमारे पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टैलेंट पूल है और 20 अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश हो रहा है। IndiaAI Mission भी ₹10,300 करोड़ के निवेश से हजारों GPU और AI डेटा लैब स्थापित करने का लक्ष्य रखता है। लेकिन, यह सब मौजूदा गलत इंसेटिव स्ट्रक्चर की वजह से कमजोर पड़ रहा है। नीतियों में बदलाव ज़रूरी है: रिइम्बर्समेंट फाइलिंग के बजाय ग्रांट मिलने पर होना चाहिए, इंसेटिव को कमर्शियलाइजेशन से जोड़ना चाहिए, और असामान्य फाइलिंग-टू-ग्रांट रेश्यो की ऑडिटिंग होनी चाहिए। रैंकिंग सिस्टम को भी सिर्फ संख्या के बजाय 'मापने योग्य प्रभाव' (measurable impact) पर केंद्रित करना होगा। चीन की सफलता का राज भी यही है कि उन्होंने इनोवेशन को इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट से जोड़ा। भारत के लिए AI में असली लीडरशिप सिर्फ तेज़ फाइलिंग से नहीं, बल्कि लगातार रिसर्च, कठोर सत्यापन और बाज़ार की सफलता से ही मिलेगी।